इंदौर | The India Speaks डेस्क | निर्मल रोकड़े
जब अधिकांश लोग रविवार को आराम करते हैं, तब इंदौर पुलिस का एक नगर सैनिक संजय सांवरे उन बच्चों को पढ़ाने में जुटे होते हैं, जिनके पास स्कूल जाने की सुविधा नहीं है।
उनकी यह ‘रविवार पाठशाला’ अब झुग्गी-बस्तियों के 63 से ज्यादा बच्चों का भविष्य संवार रही है।
👮♂️ जब फर्ज़ से आगे निकला इंसानियत का जज़्बा
साल 2016 में संजय सांवरे ने जब पहली बार पुलिस लाइन के पास रहने वाले तीन बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, तब उन्हें नहीं पता था कि यह छोटा कदम एक दिन इतना बड़ा असर लाएगा।
“मैंने सोचा कि छुट्टी के दिन इन बच्चों के लिए कुछ किया जाए,”
— संजय सांवरे, नगर सैनिक
अब हर रविवार उनकी अस्थायी कक्षा बच्चों की आवाज़ों से गुलजार रहती है।
📚 सिर्फ साक्षरता नहीं, भविष्य की बुनियाद रख रहे
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सांवरे न केवल बच्चों को बुनियादी शिक्षा देते हैं, बल्कि
उन्हें सरकारी स्कूलों में दाखिला दिलाते हैं,
पाठ योजनाएं खुद तैयार करते हैं,
और नियमित मूल्यांकन करते हैं।
उनकी मेहनत का फल मिला — 2019 में उनकी पाठशाला से 10वीं और 12वीं के सभी छात्र पास हुए, कई ने अच्छे अंक भी हासिल किए।
👏 समाज को बदलने वाली ‘पुलिसिंग’
यह पहल सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं है — यह बताती है कि पुलिस की भूमिका सिर्फ कानून लागू करने तक नहीं, बल्कि समाज निर्माण में भी है।
‘रविवार पाठशाला’ इस बात का प्रतीक बन गई है कि अगर एक व्यक्ति चाहे तो वंचितों के लिए आशा का दीपक बन सकता है।
📢 The India Speaks की राय:
“जब एक पुलिसकर्मी ड्यूटी के बाहर भी समाज की सेवा करे — तो वह सिर्फ रक्षक नहीं, असली नायक कहलाता है। संजय सांवरे का यह प्रयास प्रेरणा है उन सबके लिए, जो बदलाव लाना चाहते हैं।”












