डॉ. नितिन भगौरिया | मीडिया / लेखक


मध्य प्रदेश, भारत का हृदय स्थल, अपनी प्राकृतिक समृद्धि और सांस्कृतिक विविधता के लिए विख्यात है। यहाँ के आदिवासी समुदाय—गोंड, बैगा, भील, कोरकू और भड़िया—अपनी अनूठी परंपराओं, रीति-रिवाजों और प्रकृति से गहरे जुड़ाव के लिए जाने जाते हैं। ये समुदाय न केवल मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर का आधार हैं, बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान को भी समृद्ध करते हैं। हालांकि, आधुनिकीकरण, शहरीकरण और बाहरी प्रभावों के कारण इन समुदायों की परंपराएँ तेजी से विलुप्त हो रही हैं, जो एक गंभीर सांस्कृतिक संकट की ओर इशारा करता है।
मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदाय अपनी कला और शिल्प के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। गोंड और पिथोरा चित्रकला, जो प्रकृति, पौराणिक कथाओं और दैनिक जीवन को जीवंत करती हैं, आदिवासी रचनात्मकता का प्रतीक हैं। पहले ये चित्र मिट्टी के घरों और दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से बनाए जाते थे, लेकिन अब ये कैनवास और व्यावसायिक रंगों तक सीमित हो गए हैं। इसी तरह, बैगा समुदाय की बांस और मिट्टी की हस्तकला—टोकरी, मूर्तियाँ और आभूषण—बाजार के दबाव और सस्ते औद्योगिक उत्पादों के कारण लुप्त हो रही हैं। आधुनिक बाजार की मांग ने कारीगरों को अपनी पुश्तैनी कला छोड़कर अन्य रोजगार अपनाने को मजबूर किया है। यह न केवल कला का ह्रास है, बल्कि आदिवासी पहचान का भी क्षरण है।
आदिवासी समुदायों के लोक नृत्य और संगीत उनकी सामाजिक और धार्मिक परंपराओं का अभिन्न हिस्सा हैं। गोंड का ‘कर्मा नृत्य’, भड़िया का ‘गौर नृत्य’ और बैगा का ‘सैला नृत्य’ प्रकृति, फसल और उत्सवों से जुड़े हैं। ये प्रदर्शन सामुदायिक एकता को मजबूत करते हैं। लेकिन टेलीविजन, स्मार्टफोन और बॉलीवुड संगीत जैसे आधुनिक मनोरंजन के साधनों ने इन परंपराओं को पृष्ठभूमि में धकेल दिया है। युवा पीढ़ी इन नृत्यों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों, जैसे मांडर और नगाड़ा, को सीखने में रुचि नहीं दिखा रही। परिणामस्वरूप, ये कला रूप और उनके साथ जुड़ा सांस्कृतिक ज्ञान विलुप्त होने की कगार पर हैं।
आदिवासी समुदायों का प्रकृति के साथ गहरा जुड़ाव उनकी चिकित्सा पद्धतियों में भी झलकता है। बैगा समुदाय, जिन्हें ‘जड़ी-बूटी के वैद्य’ के रूप में जाना जाता है, जंगल की जड़ी-बूटियों से रोगों का उपचार करते थे। यह ज्ञान पीढ़ियों से चला आ रहा था, लेकिन आधुनिक चिकित्सा और दवाइयों की उपलब्धता ने इसे कमजोर कर दिया है। नई पीढ़ी इस ज्ञान को संरक्षित करने में रुचि नहीं ले रही, जिसके कारण यह अमूल्य धरोहर खो रही है। साथ ही, जंगलों का कटाव और पर्यावरणीय बदलाव ने जड़ी-बूटियों की उपलब्धता को भी सीमित कर दिया है।
मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदायों की गोंडी, कोरकु और भीली जैसी भाषाएँ उनकी सांस्कृतिक पहचान का आधार हैं। ये भाषाएँ लोककथाओं, गीतों और मौखिक इतिहास को संजोए हुए हैं। लेकिन शिक्षा और रोजगार के लिए हिंदी और अन्य प्रमुख भाषाओं के बढ़ते उपयोग ने इन आदिवासी भाषाओं को हाशिए पर धकेल दिया है। युवा अपनी मातृभाषा में बात करने के बजाय मुख्यधारा की भाषाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कई आदिवासी भाषाएँ विलुप्त होने के खतरे में हैं। इसके परिणामस्वरूप, अनमोल लोककथाएँ और सांस्कृतिक ज्ञान लुप्त हो रहा है।
आदिवासी उत्सव, जैसे गोंड का ‘मड़ई मेला’, बैगा का ‘भगोरिया’ और भील का ‘गवरी उत्सव’, सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक हैं। लेकिन शहरीकरण, आर्थिक दबाव और पलायन ने इन उत्सवों की भव्यता को कम कर दिया है। रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने वाले युवा सामुदायिक आयोजनों में कम भाग ले रहे हैं। बाहरी संस्कृतियों का प्रभाव इन उत्सवों के मूल स्वरूप को बदल रहा है, जिससे उनकी प्रामाणिकता खतरे में है।
आदिवासी परंपराएँ प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव पर आधारित हैं। वृक्ष पूजा, नदी पूजा और अन्य अनुष्ठान पर्यावरण संरक्षण की भावना को दर्शाते हैं। लेकिन जंगलों का विनाश, खनन और औद्योगीकरण ने इस संबंध को कमजोर किया है। आदिवासियों की आजीविका और सांस्कृतिक प्रथाएँ जंगलों पर निर्भर हैं, और इनके क्षरण ने उनकी परंपराओं को गहरा आघात पहुंचाया है।
मध्य प्रदेश सरकार और गैर-सरकारी संगठनों ने आदिवासी कला, संस्कृति और भाषा को संरक्षित करने के लिए कुछ प्रयास शुरू किए हैं। गोंड चित्रकला को वैश्विक मंच पर पहचान मिली है, और भाषा संरक्षण के लिए दस्तावेजीकरण का कार्य चल रहा है। लेकिन ये प्रयास अपर्याप्त हैं। सरकार को आदिवासी कला और शिल्प के लिए बाजार उपलब्ध कराना चाहिए, स्कूलों में आदिवासी भाषाओं को पढ़ाने की व्यवस्था करनी चाहिए, और सांस्कृतिक उत्सवों को प्रोत्साहन देना चाहिए। साथ ही, पर्यावरण संरक्षण और जंगलों के पुनर्जनन पर ध्यान देना होगा।आदिवासी परंपराओं का लोप केवल सांस्कृतिक हानि नहीं, बल्कि भारत की विविधता का क्षरण है। इन परंपराओं को बचाना केवल आदिवासियों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो मध्य प्रदेश की यह अमूल्य धरोहर हमेशा के लिए खो जाएगी।











