खनन की इजाजत = विरासत की विदाई
जयपुर। सत्यनारायण शर्मा | The India Speaks
अरावली को लेकर आज देश एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां लिया गया एक निर्णय सदियों की विरासत को समाप्त कर सकता है। 20 नवंबर 2025 को उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया फैसला केवल एक कानूनी आदेश नहीं है, बल्कि वह क्षण है जहां से अरावली का भविष्य या तो सुरक्षित होगा या हमेशा के लिए खो जाएगा।
यह समझना जरूरी है कि पहाड़ कोई परियोजना नहीं होते जिन्हें तोड़कर दोबारा बना लिया जाए। नदियां सूखने के बाद भी लौट सकती हैं, तालाब भर सकते हैं, जंगल फिर उग सकते हैं—लेकिन एक बार कटे पहाड़ दोबारा कभी नहीं बनते। खनन केवल धरती नहीं तोड़ता, वह समय, सभ्यता और संतुलन को भी तोड़ देता है।
कानून जंगलों के लिए है, पहाड़ों के लिए नहीं
भारत में वन संरक्षण कानून हैं, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम है, पर्यावरण नियम हैं—लेकिन आश्चर्यजनक रूप से पहाड़ों को बचाने के लिए कोई स्वतंत्र और स्पष्ट कानून नहीं है। अरावली के जंगलों को कागजों में सुरक्षा मिली, लेकिन जिन पहाड़ों पर ये जंगल खड़े हैं, वही सबसे अधिक असुरक्षित छोड़ दिए गए।
1992 में बना अरावली संरक्षण कानून भी सीमित दायरे में सिमट गया। इसके बाद न्यायालयों ने समय-समय पर अरावली को बचाने की कोशिश की, लेकिन खनन लॉबी लगातार इन फैसलों को कमजोर करती रही और अंततः 2025 का निर्णय उनके लिए रास्ता खोलने वाला बन गया।
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सबसे चिंताजनक बात यह है कि अरावली की नई व्याख्या ने ही अरावली को अरावली मानने से इंकार कर दिया। पहाड़ों को इस तरह परिभाषित किया गया कि वे संरक्षण की श्रेणी से बाहर हो जाएं। यह प्रक्रिया न तो प्रकृति-सम्मत है, न ही वैज्ञानिक और न ही सांस्कृतिक।
यह काम अकेले किसी संस्था का नहीं लगता। इसमें राजनीति, प्रशासन और उद्योग का वह गठजोड़ दिखता है, जहां लाभ सर्वोपरि है और विरासत बोझ।
अब स्थिति यह बन गई है कि जिन संस्थाओं को पर्यावरण, जलवायु और वनों की रक्षा करनी थी, उन्हीं के हाथों पहाड़ों के विनाश की अनुमति दी जा रही है। यह वही स्थिति है जिसे लोकभाषा में कहा जाता है—“बाढ़ ही खेत को खा रही है।”
यदि जंगल कटेंगे तो वन कानून विफल होंगे, यदि पहाड़ कटेंगे तो जंगल अपने आप मर जाएंगे। इसके बाद वन्यजीव संरक्षण केवल फाइलों में रह जाएगा और धरती पर केवल गड्ढे बचेंगे।
न्यायपालिका से उम्मीद अभी बाकी है
भारत की न्यायपालिका ने विश्व को बार-बार दिखाया है कि वह संवैधानिक मूल्यों की अंतिम प्रहरी है। इसी कारण आज भी देश को भरोसा है कि उच्चतम न्यायालय अपने 20 नवंबर 2025 के निर्णय पर पुनर्विचार करेगा।
यह पुनर्विचार किसी दबाव में नहीं, बल्कि भविष्य की जिम्मेदारी के रूप में होना चाहिए। अरावली केवल राजस्थान की नहीं, पूरे भारत की जलवायु, जल-सुरक्षा और पारिस्थितिकी की रीढ़ है।
सरकार घोषणाएं कर सकती है, न्यायालय दिशा दे सकता है, लेकिन जब तक जनता खड़ी नहीं होगी—कुछ नहीं बदलेगा। अरावली को बचाने के लिए अब—पुनर्विचार याचिका दायर करना
अरावली साक्षरता अभियान चलाना
विद्यार्थियों, किसानों और शिक्षकों को जोड़ना
भूगर्भ वैज्ञानिकों को आगे लाना
अहिंसक आंदोलन, पदयात्रा, सत्याग्रह, धरना
‘अरावली विरासत जन अभियान’ को तेज करना
ये सब केवल विकल्प नहीं, आवश्यकता बन चुके हैं।
यदि आज अरावली को खनन के हवाले कर दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगी—
“आपने हमें पानी क्यों नहीं दिया?”
“आपने हमें पहाड़ क्यों नहीं सौंपे?”
हमारी परंपरा कहती है कि विरासत को अगली पीढ़ी तक सुरक्षित पहुंचाना ही धर्म है। लाभ क्षणिक होता है, शुभ सनातन। अरावली शुभ है—और खनन केवल लाभ।












