कांग्रेस सांसद अजय माकन ने चुनावी फंडिंग में असमानता को बताया लोकतंत्र के लिए खतरा, भाजपा से मांगा जवाब
नई दिल्ली। The India Speaks Desk
राज्यसभा में चुनाव सुधारों पर हुई चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद और पार्टी के कोषाध्यक्ष अजय माकन ने भाजपा की चुनावी फंडिंग पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने आरोप लगाया कि 2004 से 2024 के बीच भाजपा का बैंक बैलेंस ₹88 करोड़ से सीधे ₹10,107 करोड़ तक पहुंच गया, जबकि इसी अवधि में कांग्रेस का बैंक बैलेंस मात्र ₹38 करोड़ से ₹133 करोड़ तक ही बढ़ा।
माकन ने इसे लोकतंत्र में “लेवल-प्लेइंग-फील्ड की समाप्ति” बताते हुए कहा कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तभी स्वस्थ रह सकती है जब सभी दलों के बीच संसाधन संतुलित हों।
भाजपा के बैंक बैलेंस पर उठे तीखे सवाल
अजय माकन ने सदन में वर्षवार आंकड़े पेश करते हुए कहा कि पिछले दो दशकों में भाजपा की वित्तीय ताकत असामान्य रूप से बढ़ी है। उनके अनुसार:
2004: भाजपा ₹88 करोड़ | कांग्रेस ₹38 करोड़
2009: भाजपा ₹150 करोड़ | कांग्रेस ₹221 करोड़
📞 7772828778 | 7723024600
2014: भाजपा ₹295 करोड़ | कांग्रेस ₹390 करोड़
2019: भाजपा ₹3,562 करोड़ | कांग्रेस ₹315 करोड़
2024: भाजपा ₹10,107 करोड़ | कांग्रेस ₹133 करोड़
माकन ने कहा,
“जब एक पार्टी के पास विपक्ष की तुलना में 75 गुना अधिक संसाधन हों, तब इसे लोकतांत्रिक चुनाव नहीं कहा जा सकता। यह असंतुलन चुनावी प्रक्रिया को कमजोर करता है।”
चुनावी बॉन्ड प्रणाली भी बनी विवाद का केंद्र
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि चुनावी बॉन्ड प्रणाली ने भाजपा की फंडिंग को अत्यधिक बढ़ावा दिया है। यह व्यवस्था दानदाताओं की पहचान छिपाती है, जिससे पारदर्शिता प्रभावित होती है। माकन ने कहा कि इस मॉडल ने “चंदे की सरकारी गोपनीयता” को बढ़ावा दिया है।
विशेष रूप से, 2023–24 में भाजपा को:
₹4,340 करोड़ से अधिक कुल आय,
₹1,685 करोड़ से अधिक चुनावी बॉन्ड,
जबकि विपक्ष को इससे कई गुना कम धन प्राप्त हुआ।
माकन ने आरोप लगाया कि इससे चुनावों में भाजपा को अनुचित लाभ मिलता है।
कांग्रेस के खातों पर कार्रवाई पर भी उठी आवाज़
माकन ने सदन को बताया कि:
लोकसभा चुनाव 2024 से पहले कांग्रेस के बैंक खातों को फ्रीज किया गया,
बाद में ₹135 करोड़ की आयकर कटौती की गई,
और यह सब चुनावी प्रक्रिया के बीच में हुआ।
उन्होंने कहा कि यह केवल वित्तीय दबाव नहीं, बल्कि विपक्ष की तैयारी को कमजोर करने की कोशिश भी है।
लोकतंत्र के लिए क्या है बड़ा खतरा? — विश्लेषण
- संसाधनों में खाई लगातार बढ़ रही है
भाजपा का बैंक बैलेंस पिछले 20 वर्षों में 115 गुना बढ़ा है। यह सिर्फ बढ़ोतरी नहीं, बल्कि चुनावी ढांचे में असमान संसाधनों का संकेत है।
- बड़े दानदाता भाजपा को प्राथमिकता देते हैं
कांग्रेस का आरोप है कि बिजनेस हाउस “भय, दबाव और कार्रवाई के डर” से भाजपा को दान देते हैं, लेकिन विपक्ष को नहीं।
- चुनावी बॉन्ड ने पारदर्शिता को किया कमज़ोर
इससे संसाधनों का बड़ा हिस्सा एक ही पार्टी के पास एकत्रित होता है, जिससे लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा असंतुलित हो जाती है।
- क्या परिणाम प्रभावित होते हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार,
बड़े संसाधन =
→ अधिक विज्ञापन
→ अधिक प्रचार मशीनरी
→ डिजिटल व जमीनी नेटवर्क का विस्तार
यानी, लोकतांत्रिक बहस और जनता के सामने मुद्दों की प्रस्तुति भी एकतरफा हो जाती है।
सरकार की ओर से क्या आया जवाब?
बहस के दौरान भाजपा ने इन आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दी। हालांकि पार्टी यह कहती रही है कि “सभी चंदे कानून के तहत हैं और पारदर्शी प्रक्रिया का हिस्सा हैं।”
अजय माकन का यह बयान केवल आंकड़ों का विवरण नहीं है — यह भारत की चुनावी प्रणाली में बढ़ती असमानता और पारदर्शिता की कमी को लेकर गंभीर सवाल उठाता है।
चुनावी फंडिंग की यह खाई क्या लोकतंत्र में समान अवसर के सिद्धांत को कमजोर कर रही है?
सवाल बड़ा है — और जवाब की मांग भी उतनी ही बड़ी।












