The India Speaks विशेष रिपोर्ट
नई दिल्ली। भारत कृषि प्रधान देश है, और ज़मीन यहां की सबसे बड़ी संपत्ति मानी जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश के 140 करोड़ लोगों के बीच ज़मीन का बंटवारा बेहद असमान है? आम किसानों की जोत दिन-ब-दिन छोटी होती जा रही है, वहीं सरकार, धार्मिक संस्थाएं और कॉर्पोरेट्स लाखों-करोड़ों एकड़ ज़मीन के मालिक बने बैठे हैं। इस The India Speaks विशेष रिपोर्ट में हम आपको बताते हैं कि भारत में सबसे अधिक ज़मीन किसके पास है और इस असमानता का हमारे समाज पर क्या असर पड़ रहा है।
- सरकार – सबसे बड़ा ज़मीन मालिक
भारत सरकार और राज्य सरकारें मिलकर देश की सबसे बड़ी ज़मीन मालिक हैं।
भारतीय सशस्त्र बल (Defence Ministry):
सेना के पास लगभग 17.95 लाख एकड़ भूमि है। इसमें छावनियां, एयरबेस, नेवी डॉकयार्ड और प्रशिक्षण केंद्र शामिल हैं।
भारतीय रेलवे:
रेलवे देश का दूसरा सबसे बड़ा ज़मीन मालिक है, जिसके पास लगभग 4.86 लाख हेक्टेयर भूमि है। यह ज़मीन रेलवे ट्रैक, स्टेशन, कॉलोनियां और अन्य सुविधाओं के लिए उपयोग में लाई जाती है।
अन्य मंत्रालय और PSU:
तेल कंपनियों, कोल इंडिया, स्टील अथॉरिटी, पोर्ट ट्रस्ट जैसी कंपनियों के पास भी लाखों एकड़ भूमि है।
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👉 कुल मिलाकर केंद्र सरकार और उसके उपक्रमों के पास 15,531 वर्ग किलोमीटर से अधिक भूमि है।
- धार्मिक संस्थाएं – आस्था और संपत्ति का संगम
(क) कैथोलिक चर्च
भारत में सबसे बड़े गैर-सरकारी भूमि मालिकों में कैथोलिक चर्च का नाम लिया जाता है।
कुछ अनुमान बताते हैं कि चर्च के पास पूरे भारत में लाखों एकड़ ज़मीन है।
चर्च द्वारा चलाए जा रहे स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल और मिशनरी संस्थान इस संपत्ति के बड़े हिस्से का उपयोग करते हैं।
(ख) वक़्फ बोर्ड
भारत का वक़्फ बोर्ड दुनिया की सबसे बड़ी धार्मिक भूमि संस्थाओं में से एक है।
आंकड़ों के अनुसार वक़्फ बोर्ड के पास 6 लाख से अधिक संपत्तियां और लगभग 6 लाख एकड़ ज़मीन है।
यह ज़मीन मस्जिदों, मदरसों, कब्रिस्तानों और धार्मिक-शैक्षणिक संस्थाओं के लिए उपयोग होती है।
(ग) हिंदू मंदिर और ट्रस्ट
भारत के प्रमुख मंदिर और ट्रस्ट भी विशाल संपत्ति के मालिक हैं।
तिरुपति बालाजी मंदिर के पास 23 मंदिरों के साथ-साथ सैकड़ों एकड़ भूमि है।
पद्मनाभस्वामी मंदिर की संपत्ति को दुनिया की सबसे अमीर धार्मिक संपत्तियों में गिना जाता है।
काशी विश्वनाथ, शिर्डी साई बाबा, सिद्धिविनायक जैसे मंदिरों के पास भी बड़ी मात्रा में भूमि और दान से प्राप्त संपत्ति है।
- कॉर्पोरेट घराने – व्यापार के लिए ज़मीन की होड़
जहां धार्मिक संस्थाएं आस्था के नाम पर ज़मीन की मालिक हैं, वहीं बड़े कॉर्पोरेट घराने भी भूमि अधिग्रहण में पीछे नहीं हैं।
अदानी और अंबानी समूह ने बंदरगाह, एयरपोर्ट और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए हजारों एकड़ ज़मीन अधिग्रहित की है।
रियल एस्टेट कंपनियों के पास भी महानगरों में करोड़ों की कीमत वाली ज़मीन है।
- किसान – असली मालिक या बचे-खुचे हिस्सेदार?
भारत की आबादी का लगभग 60% हिस्सा आज भी कृषि पर निर्भर है, लेकिन किसानों के पास ज़मीन का हिस्सा बेहद छोटा होता जा रहा है।
औसत जोत आकार 1970-71 में 2.28 हेक्टेयर था, जो 2015-16 में घटकर केवल 1.08 हेक्टेयर रह गया।
छोटे और सीमांत किसान अब 85% से अधिक हैं, जिनके पास मुश्किल से 1 हेक्टेयर तक ज़मीन है।
👉 यानी, जिनके हाथों में देश का पेट पालने की जिम्मेदारी है, वही ज़मीन के मामले में सबसे कमजोर स्थिति में हैं।
- सामाजिक और राजनीतिक सवाल
यह असमानता कई गंभीर सवाल खड़े करती है:
क्या ज़मीन का उपयोग समाज और जनता की भलाई के लिए हो रहा है?
क्यों लाखों एकड़ सरकारी और धार्मिक ज़मीन बेकार पड़ी रहती है, जबकि किसानों को 1-2 बीघा ज़मीन पर गुज़ारा करना पड़ता है?
क्या धार्मिक और कॉर्पोरेट संस्थाओं की भूमि पर भी पारदर्शी नियम लागू नहीं होने चाहिए?
विशेषज्ञों की राय
भूमि मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत में ज़मीन का वितरण केवल संपत्ति का नहीं, बल्कि सत्ता और संसाधन पर पकड़ का भी सवाल है।
“भारत में ज़मीन सुधार की बात दशकों से हो रही है, लेकिन नीतियों का फायदा वही संस्थाएं उठाती हैं जिनके पास पहले से विशाल संपत्ति है। आम किसान हमेशा हाशिये पर ही रहता है।”
निष्कर्ष
भारत में ज़मीन के सबसे बड़े मालिक सरकार और उसके उपक्रम हैं। लेकिन गैर-सरकारी स्तर पर धार्मिक संस्थाओं – चर्च, वक़्फ बोर्ड और मंदिर ट्रस्ट – की संपत्ति भी किसी से कम नहीं। इसके अलावा कॉर्पोरेट जगत भी लगातार भूमि अधिग्रहण कर रहा है।
वहीं दूसरी ओर छोटे किसान अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
👉 सवाल यही है कि क्या भारत में ज़मीन कभी सच में “जनता की संपत्ति” बन पाएगी या यह हमेशा संस्थागत शक्ति का प्रतीक ही बनी रहेगी?












