जातिवाद और अंधविश्वास के खिलाफ उठाई आवाज, स्त्रियों और पिछड़े वर्गों को दिलाया आत्मसम्मान
The India Speaks Desk
ई. वी. रामास्वामी नायकर, जिन्हें पूरी दुनिया पेरियार (महान व्यक्ति) के नाम से जानती है, आधुनिक भारत के उन महान समाज सुधारकों में गिने जाते हैं जिन्होंने जातिवाद, अंधविश्वास और अन्याय के खिलाफ आजीवन संघर्ष किया। उनका जन्म 17 सितम्बर 1879 को तमिलनाडु के ईरोड में हुआ था और 24 दिसम्बर 1973 को वे इस दुनिया से विदा हो गए।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
पेरियार का जन्म एक सम्पन्न व्यापारी परिवार में हुआ था। वे औपचारिक शिक्षा में अधिक आगे नहीं बढ़ पाए, लेकिन स्वाध्याय और अनुभवों से उन्होंने जीवन की गहराई को समझा। बचपन से ही वे अन्याय और रूढ़िवादिता के खिलाफ खड़े होने का साहस रखते थे।
कांग्रेस से अलग होकर शुरू किया स्वाभिमान आंदोलन
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पेरियार ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस से जुड़कर कार्य किया, लेकिन जब उन्हें लगा कि कांग्रेस जातिगत अन्याय और पिछड़े वर्गों के सवालों पर गंभीर नहीं है, तो उन्होंने 1925 में स्वाभिमान आंदोलन (Self-Respect Movement) की शुरुआत की।
इस आंदोलन ने जातिगत भेदभाव, ब्राह्मणवाद और अंधविश्वास के खिलाफ संघर्ष किया और समानता, शिक्षा तथा महिला स्वतंत्रता की आवाज बुलंद की।
सामाजिक और राजनीतिक योगदान
पेरियार ने मूर्ति पूजा, जातिवाद और धार्मिक अंधविश्वासों का कड़ा विरोध किया।
उन्होंने महिला अधिकारों की वकालत की — विधवा विवाह, अंतर्जातीय विवाह और स्त्रियों की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित किया।
1938 में उन्होंने हिंदी थोपने के खिलाफ बड़ा आंदोलन छेड़ा, जिसने आगे चलकर तमिल पहचान और द्रविड़ राजनीति को मजबूत किया।
उनके विचारों से प्रभावित होकर ही द्रविड़ आंदोलन आगे बढ़ा और बाद में DMK जैसी पार्टियाँ बनीं।
पत्रकारिता और विचारधारा का प्रचार
पेरियार ने “कुदी अरसु” नामक अखबार चलाया, जिसमें वे अपने क्रांतिकारी विचार लिखते थे। उनके लेखों ने समाज में सोच की नई लहर पैदा की और लाखों युवाओं को प्रेरित किया।
विरासत और महत्व
पेरियार ने अपने जीवन से यह साबित किया कि सच्ची स्वतंत्रता तभी संभव है जब समाज जातिवाद, भेदभाव और अंधविश्वास की बेड़ियों से मुक्त हो।
आज भी तमिलनाडु की राजनीति, समाज और संस्कृति पर उनका गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। उन्हें “द्रविड़ों का पिता” और “आधुनिक तमिल समाज का शिल्पकार” कहा जाता है।












