नर्मदा तट स्थित सुंदर धाम आश्रम में चार माह तक चलेगी कठोर साधना, बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालु
बड़वाह। The India Speaks Desk
नावघाट खेड़ी स्थित मां नर्मदा के उत्तर तट पर बने सुंदर धाम आश्रम में शुक्रवार को बसंत पंचमी के पावन अवसर से संतों की कोठ-खप्पर धुनी तपस्या का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर महंत श्री बालकदास जी महाराज ने अन्य संतों के साथ विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया।
पूजन के पश्चात आश्रम परिसर में हवन एवं भंडारा प्रसादी का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।
श्री श्री 108 नारायण दास जी महाराज ने जानकारी देते हुए बताया कि कोठ-खप्पर धुनी तपस्या बसंत पंचमी से प्रारंभ होकर गंगा दशहरे तक, लगभग चार माह तक चलती है। इस दौरान प्रतिदिन दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक संत, महामंडलेश्वर महंत श्री बालकदास जी महाराज के सानिध्य में कठोर साधना करेंगे।
उन्होंने बताया कि तपस्या के दौरान संत प्रज्वलित कंडों का घेरा बनाकर अपने सिर पर जलता हुआ खप्पर रखकर ईश्वर की आराधना करते हैं।
ब्रह्मलीन संत सुंदर दास जी महाराज की परंपरा
यह तपस्या सुंदर धाम आश्रम की एक प्राचीन परंपरा है, जिसकी शुरुआत ब्रह्मलीन संत श्री सुंदर दास जी महाराज के समय से मानी जाती है। आश्रम के वर्तमान गादीपति महंत श्री बालकदास जी महाराज स्वयं कई वर्षों से इस तप का निर्वहन कर रहे हैं। इस तपस्या के अंतर्गत पंच धुनी, सप्त धुनी, द्वादश धुनी एवं 84 धुनी के रूप में विभिन्न चरणों में साधना की जाती है।
नारायण दास जी महाराज के अनुसार
“कोठ-खप्पर धुनी तपस्या 18 वर्षों में पूर्ण होती है, जो छह चरणों में संपन्न होती है। पहला चरण पंच धुनी कहलाता है, जो तीन वर्षों का होता है और बसंत पंचमी से ही प्रारंभ होता है।”
उन्होंने बताया कि पंच धुनी में चार स्थानों पर अग्नि जलाई जाती है, जबकि पांचवें स्थान पर सूर्य देव की आराधना होती है। इसके बाद सप्त धुनी, 12 धुनी और 84 धुनी के चरण आते हैं, जिनमें संत आग का गोल घेरा बनाकर तपस्या करते हैं, जिसे कोठ या खप्पर कहा जाता है।
इस अवसर पर आश्रम परिसर में बड़ी संख्या में संत, साधु एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे।
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