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अधिक मास में भक्ति, दान और श्रीकृष्ण आराधना का विशेष महत्व, मंदिर में प्रतिदिन हो रहा आकर्षक श्रृंगार

खरगोन। The India Speaks Desk

सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र माने जाने वाले पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) की शुरुआत के साथ ही खरगोन के सराफा बाजार स्थित कृष्ण मंदिर में भक्ति और आध्यात्मिकता का विशेष माहौल देखने को मिल रहा है। पूरे महीने मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के विशेष पूजन, आकर्षक श्रृंगार, भजन-कीर्तन और धार्मिक आयोजनों का सिलसिला जारी रहेगा।

मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित अनुपम ठक्कर ने बताया कि पुरुषोत्तम मास भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को समर्पित माना जाता है। इस दौरान की गई पूजा-अर्चना, जप, तप और दान का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से इस पूरे महीने निष्काम भाव से प्रभु भक्ति करने और धर्म लाभ लेने का आह्वान किया।

क्यों कहा जाता है इसे पुरुषोत्तम मास?

पंडित अनुपम ठक्कर ने बताया कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य और चंद्र वर्ष के अंतर को संतुलित करने के लिए अतिरिक्त महीने की उत्पत्ति हुई थी। प्रारंभ में इस मास को “मलमास” कहकर उपेक्षित किया गया, लेकिन बाद में भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम “पुरुषोत्तम” प्रदान किया। तभी से यह महीना अत्यंत पुण्यदायी और भगवान विष्णु को प्रिय माना जाता है।

मंदिर में विशेष श्रृंगार और भजनों की गूंज

सराफा बाजार स्थित कृष्ण मंदिर में प्रतिदिन ठाकुर जी का विशेष श्रृंगार किया जा रहा है। शाम होते ही मंदिर परिसर कृष्ण भजनों और संकीर्तन से भक्तिमय वातावरण में बदल जाता है। श्रद्धालु बड़ी संख्या में दर्शन और पूजन के लिए पहुंच रहे हैं।

“पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा और सेवा भाव से किया गया दान एवं भक्ति जीवन में सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है।”
— पंडित अनुपम ठक्कर

पुरुषोत्तम मास में तिथि अनुसार दान का विशेष महत्व

पंडित अनुपम ठक्कर के अनुसार इस पूरे महीने तिथि अनुसार विशेष दान करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि इससे पुण्य फल की प्राप्ति होती है और जीवन में सकारात्मकता आती है।

शुक्ल पक्ष में किए जाने वाले प्रमुख दान

  • प्रतिपदा – दीप दान, मालपुआ दान
  • द्वितीया – दूध, दही, चाँदी दान
  • तृतीया – नारियल, केले, धन दान
  • चतुर्थी – चंदन, गाय का घी, गोले दान
  • पंचमी – जल दान, धूपबत्ती, सुगंधित वस्तुएं
  • षष्ठी – पालना, छोटे वस्त्र या चुन्नी दान
  • सप्तमी – भूमि दान, आसन, मोती दान
  • अष्टमी – तुवर दाल, माला, मखमल दान
  • नवमी – पंचरत्न, मोती, मिश्री दान
  • दशमी – घी, पात्र और गाय के वस्त्र दान
  • एकादशी – मूंगफली, चाँदी के दीपक दान
  • द्वादशी – मोगरा फूल, ताँबे के कलश दान
  • त्रयोदशी – मालपुआ, अनारसा, गेहूँ दान
  • चतुर्दशी – केशर, सिंघाड़ा सामग्री, सोना दान
  • पूर्णिमा – पंचधातु, तिल पात्र और काँसे के पात्र दान

कृष्ण पक्ष में किए जाने वाले प्रमुख दान

  • प्रतिपदा – दीपदान, जल पात्र, बर्तन दान
  • द्वितीया – चप्पल, आसन, चावल, खीर दान
  • तृतीया – तिल्ली, गुड़, नमक दान
  • चतुर्थी – गुड़ और पंच मेवा दान
  • पंचमी – गुड़, शक्कर और चावल दान
  • षष्ठी – घी एवं सब्जी दान
  • सप्तमी – सिंघाड़ा, हल्दी और घी दान
  • अष्टमी – गोपीचंदन, राजगीरा, पंचफल दान
  • नवमी – साबुत सामग्री दान
  • दशमी – फलदान और वस्त्र दान
  • एकादशी – ऋतु फल, स्वर्ण और गन्ने की गाँठ दान
  • द्वादशी – किशमिश, अंगूर और फलाहारी वस्तुएं दान
  • त्रयोदशी – बर्तन, खीर और चाँदी पात्र दान
  • चतुर्दशी – मालपुआ और पुष्प वस्त्र दान
  • अमावस्या – गेहूँ, मालपुआ, खजला और कथा श्रवण

मंदिर समिति ने श्रद्धालुओं से पूरे पुरुषोत्तम मास में धार्मिक आयोजनों में शामिल होकर आध्यात्मिक लाभ लेने की अपील की है।

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