इंदौर–इच्छापुर रोड पर स्थित काटकूट फाटा तिराहा के भी गड्ढे है बेहद खतरनाक
बड़वाह। The India Speaks Desk
बड़वाह में सड़क हादसों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। महेश्वर रोड पर हुए हालिया दर्दनाक हादसे में 27 वर्षीय शिवम यादव की मौत ने पूरे शहर को झकझोर दिया था। बावजूद इसके प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं। हालात न सुधरने से लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है और सड़कें अब भी ‘मौत का जाल’ बनी हुई हैं।
महेश्वर रोड हादसा और गड्ढों की भूमिका
महेश्वर रोड पर सोमवार को हुई दुर्घटना में शिवम यादव गड्ढों के कारण फिसली बाइक में आयशर वाहन की चपेट में आ गए। वाहन क्रमांक MP 09 GH 5984 था। यह हादसा स्थानीय लोगों और प्रशासन दोनों के लिए चेतावनी बनना चाहिए था। लेकिन महेश्वर रोड पर हुई यह मौत प्रशासन के लिए केवल एक ‘अलार्म’ तक सीमित रह गई। गड्ढे अभी भी कई जगहों पर बने हुए हैं, और अन्य सड़कें भी उसी किस्म की खतरनाक स्थिति में हैं।
काटकूट फाटा तिराहा: एक और खतरा
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इंदौर–इच्छापुर रोड पर स्थित काटकूट फाटा तिराहा बारिश के कारण बड़े-बड़े गड्ढों से भरा हुआ है। स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां रोजाना राहगीरों और वाहन चालकों की जान जोखिम में पड़ती है। महेश्वर रोड जैसी बड़ी दुर्घटना का खतरा यहां भी दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है।
जनता का गुस्सा और सवाल
महेश्वर रोड हादसे के बाद भी प्रशासन की सक्रियता केवल कागज़ी रही। स्थानीय युवा और प्रदर्शनकारी पूछ रहे हैं—
“प्रशासन मौत का इंतज़ार क्यों करता है? जब तक किसी की जान नहीं जाती, तब तक काम क्यों नहीं होता?”
हादसे के बाद शिवम यादव के मित्र और महेश्वर रोड के लोग सड़क पर चक्का जाम कर विरोध जताते रहे। उन्होंने मृतक के परिवार के लिए एक करोड़ रुपए का मुआवजा और पूरे सड़क मार्ग के डामरीकरण की मांग की।
प्रशासन की लापरवाही और भविष्य का खतरा
स्थानीय लोग आरोप लगा रहे हैं कि एमपीआरडीसी और नगर प्रशासन केवल टोल वसूली में सक्रिय रहते हैं, लेकिन सड़क सुरक्षा के मामले में लगातार लापरवाह हैं। 1 जनवरी 2025 से महेश्वर रोड पर टोल वसूली शुरू हुई, लेकिन सड़क की हालत सुधारने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए। अब तक हुई मरम्मत केवल ‘पैबंद’ स्तर की रही।
निष्कर्ष
बड़वाह की सड़कें अब भी खतरे की घंटी बजा रही हैं। महेश्वर रोड हादसा और लगातार बने गड्ढे स्पष्ट संदेश देते हैं—यदि प्रशासन समय रहते कदम नहीं उठाता, तो यह लापरवाही और मौतें आगे भी जारी रहेंगी। जनता का सवाल अब सिर्फ़ एक ही है—कौन लेगा जिम्मेदारी?












