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भोपाल | 01 अगस्त 2025

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में आज एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला, जब समाजवादी पार्टी (सपा) ने विधानसभा घेराव कर कांग्रेस और भाजपा दोनों को एक साथ कटघरे में खड़ा कर दिया। यह प्रदर्शन किसी सामान्य विरोध की तरह नहीं था, बल्कि एक रणनीतिक प्रयास की तरह था—मध्यप्रदेश में तीसरे विकल्प की राजनीतिक ज़मीन तलाशने की एक मजबूत दस्तक।


सड़कों पर सपा: जनमुद्दों पर फोकस या राजनीतिक स्टंट?

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प्रदेश अध्यक्ष डॉ. मनोज यादव के नेतृत्व में आयोजित इस जनघेराव में जहां हजारों कार्यकर्ता शामिल हुए, वहीं यूपी के पूर्व मंत्री बादशाह सिंह की उपस्थिति ने इसे राजनीतिक वज़न भी दिया। डॉ. यादव ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को लपेटते हुए साफ कहा—”दोनों ही दल जनआवाजों को कुचलने का काम कर रहे हैं, अब जनता विकल्प तलाश रही है।”

मुख्य मुद्दे जो उठाए गए:

आदिवासी, दलित और महिलाओं पर अत्याचार

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बढ़ती बेरोजगारी और युवाओं का पलायन

ओबीसी आरक्षण की अनदेखी

शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल

किसानों की आय और कर्ज़ संकट

पत्रकारों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था

यह तमाम मुद्दे ऐसे हैं जो वास्तव में राज्य की जनचिंताओं से जुड़े हुए हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या जनता अब कांग्रेस और भाजपा से थक चुकी है?


तीसरी ताक़त की तलाश: क्या सपा कर पाएगी जगह?

मध्यप्रदेश में पारंपरिक रूप से सत्ता कांग्रेस और भाजपा के बीच ही घूमती रही है। आम आदमी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे दल समय-समय पर तीसरे मोर्चे की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन असर सीमित रहा।

सपा की मौजूदा रणनीति में कुछ विशेष बातें हैं:

सीधे जनमुद्दों पर चोट

भाषणों में गठबंधन या जातीय समीकरण की जगह संवैधानिक और सामाजिक न्याय पर जोर

युवाओं और किसानों को केंद्र में रखना

इस आंदोलन में प्रदेश भर से कार्यकर्ताओं की भागीदारी और राज्यपाल को 18 सूत्रीय ज्ञापन सौंपना, यह दिखाता है कि सपा सिर्फ मंचीय राजनीति नहीं बल्कि जमीनी पकड़ भी बढ़ा रही है।


पुलिस, बैरिकेड और नेतृत्व की परख

प्रदर्शन के दौरान भोपाल पुलिस की भारी तैनाती, चार लेयर की सुरक्षा, वाटर कैनन और गिरफ्तारी के लिए बसें—यह सब सरकार की नजऱों में इस प्रदर्शन की गंभीरता को दर्शाता है। हालांकि, जब हल्की झूमाझटकी की स्थिति बनी, तब डॉ. यादव ने संयम दिखाते हुए संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को तरजीह दी, जो एक ज़िम्मेदार नेतृत्व की पहचान मानी जा सकती है।


निष्कर्ष: क्या सपा सिर्फ विरोध कर रही है या विकल्प बनना चाहती है?

यह प्रदर्शन केवल सरकार के विरोध में एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि कांग्रेस-भाजपा के विकल्प के रूप में खुद को प्रस्तुत करने की राजनीतिक चाल भी थी। लेकिन सवाल है—क्या जनता सच में विकल्प के लिए तैयार है?

अगर समाजवादी पार्टी इन मुद्दों को लेकर गांव-गांव तक पहुंच बनाती है और सक्रिय जनआंदोलन खड़ा करती है, तो मध्यप्रदेश की राजनीति में उसे ‘तीसरी ताक़त’ के रूप में उभरने से कोई नहीं रोक सकता।


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