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राघव चड्ढा ने सदन में जिस रिपोर्ट का दिया हवाला, वही मिलावट की असली तस्वीर दिखाती है

नई दिल्ली। लोकेश कोचले/The India Speaks Desk

राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने एक आधिकारिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए देश में खाद्य पदार्थों, विशेषकर दूध में मिलावट को लेकर गंभीर खुलासा किया।
उन्होंने बताया कि रिपोर्ट के अनुसार जांच के लिए लिए गए दूध के 71 प्रतिशत सैंपल में यूरिया पाया गया, जो सीधे तौर पर देश की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

राघव चड्ढा ने अपने वक्तव्य में स्पष्ट किया कि यह आंकड़ा किसी अफवाह पर नहीं, बल्कि जांच आधारित रिपोर्ट पर आधारित है।
उन्होंने कहा कि इस रिपोर्ट के निष्कर्ष यह बताते हैं कि—
देश में बिकने वाला दूध बड़े पैमाने पर मिलावटी है
उपभोक्ताओं को शुद्ध दूध मिलने की गारंटी खत्म होती जा रही है
“मां दूध पिलाती है, रिपोर्ट बताती है कि बच्चा यूरिया पी रहा है”
रिपोर्ट का हवाला देते हुए राघव चड्ढा ने भावुक अंदाज़ में कहा—
“जब एक मां अपने बच्चे को दूध पिलाती है, तो उसे लगता है कि वह कैल्शियम दे रही है, लेकिन यह रिपोर्ट बताती है कि बच्चा असल में यूरिया पी रहा है।”
उन्होंने इसे आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य के साथ खुला खिलवाड़ बताया।

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दूध उत्पादन बनाम बिक्री पर रिपोर्ट ने उठाए सवाल

सदन में रखी गई रिपोर्ट के आधार पर राघव चड्ढा ने यह भी कहा कि
देश में जितना दूध बाजार में बिक रहा है, उतना उत्पादन के आंकड़ों में मौजूद ही नहीं है, जिससे यह आशंका और गहरी होती है कि—
सिंथेटिक दूध केमिकल और यूरिया जैसी चीजों का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ रहा है।

मप्र में रिपोर्ट के दावों से जुड़ता DWGS का मामला

संसद में रिपोर्ट के इन खुलासों के बीच मध्यप्रदेश से आ रही तस्वीर और भी डरावनी है।
यहां शराब निर्माण से जुड़ी कंपनियों पर आरोप हैं कि वे यूरिया मिश्रित DWGS को पशु आहार के रूप में बेच रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि रिपोर्ट में दूध में यूरिया की पुष्टि हो रही है, तो
पशु आहार में मिलावट → पशु → दूध → इंसान
का यह पूरा चक्र गंभीर खतरे की ओर इशारा करता है।

प्रशासनिक चुप्पी पर सवाल

स्थानीय स्तर पर शिकायतों के बावजूद न तो DWGS की गुणवत्ता को लेकर कोई ठोस जांच सामने आई है,
और न ही शराब कंपनियों पर कोई सख्त कार्रवाई।
एक ओर संसद में रिपोर्ट के आधार पर मुद्दा उठाया जा रहा है,
वहीं दूसरी ओर ज़मीनी स्तर पर प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती—
यही इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू है।

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