पितृपक्ष की अमावस्या पर तर्पण और पिंडदान से तृप्त होते हैं सभी पितर
नई दिल्ली। प्रीति शर्मा | The India Speaks
श्राद्ध पक्ष का अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या कहलाता है, जिसे महालय अमावस्या भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन पितृलोक के द्वार खुले रहते हैं और पितर पृथ्वी पर अपने परिजनों के आह्वान से भोजन और जल ग्रहण करने आते हैं। यही कारण है कि श्राद्ध के इस अंतिम दिन विशेष विधि-विधान से पितरों का स्मरण किया जाता है।
श्राद्ध की प्रमुख विधि
- स्नान और संकल्प
सूर्योदय से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पितरों के नाम से संकल्प लें। - तर्पण और पिंडदान
जल, तिल, कुशा और पुष्प से तर्पण करें। चावल, आटा, तिल, शहद और घी से पिंड बनाकर पितरों को अर्पित करें। - ब्राह्मण भोजन और दान
ब्राह्मणों को भोजन कराना और अन्न, वस्त्र, दक्षिणा, फल आदि दान करना पितरों की आत्मा की तृप्ति के लिए श्रेष्ठ माना गया है। - गौ, कौवा और कुत्ते को भोजन
मान्यता है कि पितर इन रूपों में आकर भोजन ग्रहण करते हैं, इसलिए इनके लिए भी भोजन अवश्य निकालें।
धार्मिक महत्व
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या का दिन उन पितरों के लिए भी होता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध पूरे पितृपक्ष में नहीं किया जा सका। इस दिन श्राद्ध करने से सभी पितरों की आत्मा तृप्त होती है और वे आशीर्वाद स्वरूप परिवार को सुख, समृद्धि और संतति का वरदान देते हैं।
विशेषज्ञ की राय
ज्योतिषाचार्य पंडित हरि कृष्ण मिश्रा के अनुसार:
“सर्वपितृ अमावस्या केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत फलदायी है। इस दिन किया गया श्राद्ध पितरों को मोक्ष प्रदान करता है और वंशजों के जीवन से बाधाओं को दूर करता है। यदि किसी कारणवश पूरे पितृ पक्ष में श्राद्ध न हो पाए तो इस दिन श्राद्ध करने से सभी पितरों की तृप्ति हो जाती है।”
निष्कर्ष
सर्वपितृ अमावस्या का दिन सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पितरों के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है। इस दिन तर्पण, पिंडदान और दान करके हम अपने पूर्वजों को स्मरण करते हैं और उनसे सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।












