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द इंडिया स्पीक्स | विशेष लेख | पीयूष भालसे

क्या आपने कभी सुना है कि किसी ने जंग तो जीती, दुश्मन के 93,000 सैनिक पकड़ लिए… लेकिन फिर बिना कोई शर्त रखे सब वापस कर दिए?

जी हाँ, ये कहानी है उस मौके की जब भारत के पास इतिहास बदलने का पूरा मौका था। कश्मीर को हमेशा के लिए अपने नक्शे में शामिल करने का मौका था…

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लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि हमने वो जीत, एक समझौते की मेज़ पर हार दी?

अगर आपको लगता है कि कश्मीर का मुद्दा 1990 से शुरू हुआ — तो आपको 1972 में चलना पड़ेगा। उस एक समझौते की कहानी जाननी पड़ेगी — जो हुआ भी, और नहीं भी… और सोचिए, अगर वो समझौता ही न होता, तो क्या होता?


1971 की जंग के बाद भारत अपने सबसे ताक़तवर दौर में था। पाकिस्तान हार चुका था। उसका एक हिस्सा बांग्लादेश बन चुका था और उसके 93,000 से ज़्यादा सैनिक भारत की कैद में थे। यह दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी सैन्य हारों में से एक मानी जाती है। भारत ने सिर्फ जंग नहीं जीती थी, बल्कि पाकिस्तान की पूरी इज्ज़त, उसकी फौज, उसका आत्मविश्वास सबकुछ तोड़ दिया था।

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उस वक़्त इंदिरा गांधी दुनिया की सबसे ताक़तवर नेताओं में गिनी जाने लगी थीं। हमारे पास सैनिक भी थे, ज़मीन भी, और दुनिया की सहमति भी।


तो फिर सवाल ये है — जब हमारे पास सब कुछ था, तो हमने मांगा क्या?

क्या हमने पाकिस्तान से कहा कि वो PoK यानी पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर हमें वापस करे?

क्या हमने कहा कि कश्मीर का मुद्दा हमेशा के लिए खत्म हो?

नहीं। हुआ ये कि अगले ही साल, 2 जुलाई 1972 को शिमला में एक समझौता हुआ — जिसमें पाकिस्तान से सिर्फ ये वादा लिया गया कि अब आगे से दोनों देश आपस में बैठकर ही बात करेंगे। कोई कानूनी गारंटी नहीं, कोई लिखित वादा नहीं। और बदले में हमने क्या किया? 93,000 सैनिक वापस कर दिए।


लेकिन रुकिए… इससे पहले कि आप सोचें कि ये एक आम डील थी, आपको एक और कहानी जाननी पड़ेगी — जो उस वक्त पर्दे के पीछे चल रही थी। शिमला में जब समझौता होने वाला था, उस रात ज़ुल्फिकार अली भुट्टो अचानक नाराज़ होकर होटल छोड़कर चले गए थे।

दरअसल भारत ने कश्मीर पर कुछ शर्तें रखीं थीं, और भुट्टो उन पर तैयार नहीं थे। वो कहने लगे कि अगर भारत ने मेरी इज़्ज़त नहीं बचाई, तो मैं पाकिस्तान में ज़िंदा नहीं बचूँगा। उनकी हालत ऐसी थी कि वो गिड़गिड़ा रहे थे — कि सैनिक वापस करो, मैं सब संभाल लूँगा।

इंदिरा गांधी के सलाहकारों ने उन्हें कहा कि अभी PoK पर दबाव बनाने का सही वक्त है — लेकिन इंदिरा ने अंतरराष्ट्रीय छवि और शांति को तवज्जो दी।


कुछ रिपोर्ट्स में तो ये भी कहा गया है कि भारत ने PoK को लेकर कुछ दस्तावेज़ तैयार कर लिए थे — यानी एक रणनीति बना ली थी कि कैसे पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बनाकर PoK को वापस लिया जाए। लेकिन शिमला समझौते के बाद ये प्लान वहीं फाइलों में दबकर रह गया।


अब सोचिए, अगर शिमला समझौता न होता — तो क्या होता?


पहला: भारत 5000 किलोमीटर से ज्यादा पाकिस्तानी ज़मीन तब तक नहीं लौटाता जब तक पाकिस्तान PoK पर ठोस वादा न करता।


दूसरा: 93000 सैनिकों की रिहाई एकदम नहीं, बल्कि एक-एक बैच में की जाती — हर बार पाकिस्तान से एक नई बात मनवाई जाती।


तीसरा: भारत Line of Control यानी LoC को सीधा-सीधा अपनी सीमा घोषित कर देता — और दुनिया के सामने उसे मान्यता दिलाने की कोशिश करता।


और ऐसा करने से कौन रोकता?

उस वक्त भारत के साथ सोवियत संघ था। अमेरिका और चीन चुप थे। पाकिस्तान की सरकार गिर चुकी थी, और भुट्टो पर खुद उसकी फौज को भरोसा नहीं था। भारत के पास वो ताकत थी, जिससे वो इतिहास बदल सकता था। लेकिन हमने शांति की नीति को चुना। भुट्टो के ज़ुबानी वादे पर भरोसा किया — और फिर वही पाकिस्तान 1999 में कारगिल कर बैठा।
अगर उस वक्त भारत ने ठोस कदम लिया होता, तो आज PoK भारत का हिस्सा हो सकता था। कश्मीर एकजुट होता। शायद वहां न आतंकवाद होता, न सेना के कैंप। जो युवा आज बंदूक से डरते हुए बड़े होते हैं, वो स्कूल-कॉलेज जाते, मैदानों में खेलते। और भारत की सीमाएं विवादों से नहीं, विकास से पहचानी जातीं।


इसे आप इतिहास की सबसे बड़ी चूक कह सकते हैं — या एक मौका, जो हमारे हाथ से निकल गया। उस वक्त हमारे पास सब कुछ था — ताकत भी, हक भी, और मोका भी। लेकिन हमने दुश्मन की बातों पर भरोसा किया, और फिर वही दुश्मन हमें सालों तक धोखा देता रहा। हम इसी इतिहास की एक बड़ी भूल भी कह सकते है।


पीयूष भालसे

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