अगर विकास की कीमत इंसानों की सांसें हैं, तो ऐसा विकास आखिर किसके लिए?
लोकेश कोचले। द इंडिया स्पीक्स
देश को बताया जा रहा है कि एथेनॉल भारत के ऊर्जा भविष्य का नया अध्याय है। इसे हरित ईंधन, आत्मनिर्भरता और किसानों की समृद्धि का प्रतीक बताया जा रहा है। लेकिन मेघालय का बरनियाहट एक ऐसा आईना बनकर सामने आया है, जो इस पूरी कहानी का दूसरा और कहीं अधिक भयावह चेहरा दिखा रहा है।
जब किसी शहर की हवा इतनी जहरीली हो जाए कि लोग खुलकर सांस लेने से डरें, पेड़ों की पत्तियों पर कालिख जमने लगे, घरों की छतें और खिड़कियां धूल और धुएं से काली पड़ जाएं और बच्चे, बुजुर्ग तथा आम नागरिक लगातार स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों की शिकायत करें, तब यह केवल प्रदूषण नहीं, बल्कि व्यवस्था की असफलता का जीवंत प्रमाण है।
बरनियाहट में डिस्टिलरी, एथेनॉल, सीमेंट, स्टील और अन्य भारी उद्योग संचालित हैं। सरकार और उद्योग यह दावा करते हैं कि सभी इकाइयां पर्यावरणीय मानकों का पालन कर रही हैं। यदि यह सच है, तो सवाल उठता है कि आखिर देश और दुनिया की प्रदूषण रिपोर्टों में बरनियाहट का नाम बार-बार क्यों सामने आता है?
क्या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की निगरानी पर्याप्त है?
क्या उद्योगों के वास्तविक उत्सर्जन के आंकड़े रोजाना जनता के सामने रखे जाते हैं?
क्या स्थानीय नागरिकों के स्वास्थ्य पर कोई स्वतंत्र और व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन कराया गया?
यदि जवाब “नहीं” है, तो फिर जनता को भरोसा किस आधार पर करना चाहिए?
देश में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। करोड़ों वाहन मालिकों के सामने यह विकल्प नहीं, बल्कि एक सरकारी नीति के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। ऐसे में यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह केवल लाभ ही नहीं, बल्कि संभावित जोखिम, तकनीकी सीमाएं और उपभोक्ता अधिकारों पर भी पूरी पारदर्शिता रखे।
हरित ईंधन का अर्थ केवल इतना नहीं कि वाहन के एग्जॉस्ट से कुछ कम उत्सर्जन निकले। यदि उस ईंधन के उत्पादन के लिए चल रहे उद्योगों के आसपास रहने वाले लोग प्रदूषण का बोझ उठा रहे हों, तो विकास की पूरी अवधारणा पर पुनर्विचार होना चाहिए।
आज जरूरत किसी उद्योग के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं है। जरूरत इस बात की है कि सरकार, प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियां और उद्योग मिलकर जनता के सामने हर तथ्य रखें। हर उद्योग का वास्तविक उत्सर्जन डेटा सार्वजनिक किया जाए। हर शिकायत की स्वतंत्र जांच हो। और यदि कहीं भी नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो कार्रवाई केवल नोटिस तक सीमित न रहे।
बरनियाहट केवल मेघालय का एक औद्योगिक शहर नहीं है। यह पूरे देश के लिए चेतावनी है। यदि आज हमने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया, तो आने वाली पीढ़ियां हमसे यही पूछेंगी कि हमने उनकी सांसों की कीमत पर किसका विकास किया था।
सरकार से सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या भारत हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है, या फिर “हरित” शब्द की आड़ में जनता से ऐसे सवाल छिपाए जा रहे हैं जिनका जवाब देना अब अनिवार्य हो चुका है?
जब हवा जहरीली हो जाए, तब आंकड़ों से ज्यादा लोगों की सांसों पर भरोसा करना पड़ता है। और जब जनता सवाल पूछने लगे, तो लोकतंत्र की पहली जिम्मेदारी जवाब देना होती है—चुप रहना नहीं।












