नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान अपनाया गया New Delhi Declaration 2026 कूटनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भारत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया जा रहा है। वैश्विक दक्षिण की आवाज, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, व्यापार, स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कृषि, ऊर्जा और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे कई बड़े मुद्दों पर सदस्य देशों ने सहमति जताई है।
लेकिन इस पूरी तस्वीर का एक जरूरी सवाल है, जिसे चमकदार कूटनीतिक भाषा के पीछे नहीं छिपाया जाना चाहिए।
आखिर इस घोषणा से भारत के आम नागरिक को क्या मिलेगा?
क्या किसान की आमदनी बढ़ेगी? क्या बेरोजगार युवा को नौकरी मिलेगी? क्या छोटे व्यापारी को सस्ता कर्ज मिलेगा? क्या महंगाई कम होगी? क्या गरीब परिवार की शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था बेहतर होगी?
यहीं से BRICS की असली परीक्षा शुरू होती है।
बड़ी अर्थव्यवस्था, बड़ा मंच और बड़ा सवाल
BRICS आज केवल कुछ देशों का आर्थिक समूह नहीं रह गया है। इसका विस्तार हुआ है और सदस्य देश वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, व्यापार और कूटनीति में बड़ी भूमिका रखते हैं।
New Delhi Declaration में व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने, सीमा-पार भुगतान को अधिक प्रभावी बनाने तथा सदस्य देशों की स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ाने की दिशा में सहयोग की बात कही गई है। BRICS Payment Task Force के माध्यम से भुगतान प्रणालियों के बेहतर एकीकरण की संभावनाएं भी तलाशने की बात सामने आई है।
यह व्यवस्था भविष्य में व्यापार की लागत और कुछ लेन-देन संबंधी बाधाओं को कम कर सकती है।
लेकिन सवाल यह है कि इसका लाभ सबसे पहले किसे मिलेगा?
संभावना यही है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने वाली बड़ी कंपनियां, निर्यातक और बड़े कारोबारी इससे सबसे पहले लाभ उठा पाएंगे। छोटे व्यापारी और आम उपभोक्ता तक इसका फायदा पहुंचने के लिए अलग नीतियों और प्रभावी क्रियान्वयन की जरूरत होगी।
यानी BRICS का आर्थिक फायदा अपने आप आम आदमी की जेब तक नहीं पहुंचने वाला।
किसान के लिए घोषणाएं हैं, गारंटी नहीं
घोषणा में कृषि क्षेत्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रयासों का उल्लेख है। BRICS AGRIN, Digital Agriculture Network, Agroecology और Regenerative Agriculture से जुड़े नेटवर्क तथा किसानों के बीज अधिकारों पर Global Forum जैसे कदम उठाए गए हैं। इनका उद्देश्य कृषि ज्ञान, तकनीक और अनुभवों का आदान-प्रदान बढ़ाना है।
कागज पर यह निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है।
लेकिन भारतीय किसान के सामने आज का सवाल कहीं ज्यादा सीधा है।
उसे अपनी उपज का लाभकारी दाम कब मिलेगा? खाद, बीज और डीजल की लागत कैसे घटेगी? मौसम की मार से होने वाले नुकसान की भरपाई कैसे होगी? खेती में बढ़ती लागत और घटते मुनाफे का अंतर कौन कम करेगा?
BRICS की कृषि पहल इन समस्याओं के समाधान की दिशा में मदद कर सकती हैं, लेकिन Declaration अपने आप किसान की आय बढ़ाने की गारंटी नहीं देता।
यही फर्क घोषणाओं और वास्तविक बदलाव के बीच है।
MSME को मौका, लेकिन कॉरपोरेट को बढ़त?
BRICS में छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए वित्तीय पहुंच, व्यापार और भुगतान व्यवस्था को बेहतर बनाने की चर्चा हुई है। यदि इन व्यवस्थाओं को वास्तविक रूप दिया जाता है तो छोटे कारोबारियों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच और वित्तीय सुविधाओं में लाभ मिल सकता है।
लेकिन भारत में एक पुरानी समस्या है।
नीति बनाते समय “व्यवसाय” को अक्सर एक समान श्रेणी मान लिया जाता है, जबकि एक तरफ हजारों करोड़ रुपये का कारोबार करने वाली कंपनी है और दूसरी तरफ पांच कर्मचारियों के साथ दुकान या छोटी फैक्ट्री चलाने वाला कारोबारी।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियमों, डिजिटल भुगतान प्रणालियों और विदेशी बाजारों का लाभ उठाने की क्षमता दोनों की समान नहीं है।
इसलिए BRICS की नई आर्थिक व्यवस्था तभी वास्तव में समावेशी मानी जाएगी, जब इसका लाभ बड़े उद्योगों से आगे बढ़कर छोटे कारोबारी, स्थानीय निर्माता, किसान उत्पादक संगठन और स्वरोजगार करने वाले लोगों तक पहुंचे।
रोजगार सबसे बड़ा सवाल, लेकिन जवाब अभी अधूरा
BRICS देशों के बीच व्यापार और निवेश बढ़ता है तो भारत में उत्पादन, निर्यात और नई औद्योगिक गतिविधियों के अवसर बढ़ सकते हैं।
लेकिन व्यापार बढ़ना और रोजगार बढ़ना एक ही बात नहीं है।
यदि नई अर्थव्यवस्था पूंजी और तकनीक आधारित होती गई तथा रोजगार सृजन उसी अनुपात में नहीं हुआ तो GDP के आंकड़े बढ़ सकते हैं, लेकिन सामान्य परिवार की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव जरूरी नहीं है।
आज भारत के युवा के लिए BRICS की सफलता का पैमाना यह नहीं होगा कि घोषणा में कितने समझौते हुए।
उसके लिए असली सवाल होगा—नौकरी कितनी बनी?
कितने युवाओं की आय बढ़ी?
कितने छोटे कारोबार टिके?
और कितने परिवार गरीबी से बाहर आए?
AI और तकनीक: अवसर भी, खतरा भी
BRICS Declaration में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीकों पर भी जोर दिया गया है। Global South के लिए भरोसेमंद, समावेशी और ऊर्जा-कुशल AI व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया गया है।
यह भारत के लिए बड़ा अवसर हो सकता है।
लेकिन AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ रोजगार का सवाल भी जुड़ा है। जिन कामों को मशीनें और AI तेजी से करने लगेंगे, वहां कम-कुशल कर्मचारियों के सामने नई चुनौती खड़ी होगी।
इसलिए तकनीकी विकास के साथ बड़े पैमाने पर skill development और रोजगार संक्रमण की नीति जरूरी होगी।
वरना तकनीक उत्पादकता तो बढ़ाएगी, लेकिन उसका लाभ समाज के हर वर्ग तक समान रूप से नहीं पहुंच पाएगा।
ऊर्जा और महंगाई का रिश्ता
BRICS ने ऊर्जा सुरक्षा और न्यायपूर्ण एवं समावेशी ऊर्जा संक्रमण पर जोर दिया है। घोषणा में यह भी स्वीकार किया गया है कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए पारंपरिक ऊर्जा स्रोत अभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आम आदमी के लिए इसका महत्व बहुत बड़ा है।
क्योंकि ऊर्जा केवल बिजली का सवाल नहीं है।
पेट्रोल, डीजल, परिवहन, खाद, सिंचाई, उद्योग और अंततः हर वस्तु की कीमत ऊर्जा से जुड़ी है।
यदि BRICS ऊर्जा सुरक्षा और स्थिर आपूर्ति में सहयोग बढ़ाने में सफल होता है तो लंबे समय में इसका असर महंगाई पर पड़ सकता है।
लेकिन फिर वही सवाल—क्या यह लाभ उपभोक्ता तक पहुंचेगा?
कूटनीति में भारत को फायदा, लेकिन घर की रसोई में?
New Delhi Declaration का भारत के लिए सबसे स्पष्ट लाभ कूटनीतिक है।
आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख, वैश्विक संस्थाओं में सुधार, Global South की भूमिका और भारत की वैश्विक स्थिति को मजबूत करने की दिशा में सहमति भारत के लिए महत्वपूर्ण है। Declaration में पहलगाम आतंकी हमले की भी निंदा की गई है और आतंकवाद के खिलाफ zero tolerance की बात दोहराई गई है।
यह भारत की विदेश नीति के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
लेकिन आम नागरिक के लिए विदेश नीति की सफलता अंततः घरेलू जीवन में भी दिखाई देनी चाहिए।
अगर देश वैश्विक मंच पर मजबूत होता है लेकिन किसान कर्ज में डूबा रहता है, युवा रोजगार तलाशता रहता है, छोटा व्यापारी महंगे कर्ज से परेशान रहता है और मध्यम वर्ग महंगाई से जूझता रहता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि वैश्विक ताकत बनने का लाभ समाज के निचले और मध्य वर्ग तक कब पहुंचेगा।
BRICS की सफलता का असली पैमाना GDP नहीं, जीवन स्तर होगा
New Delhi Declaration को न तो केवल कागजी घोषणा कह देना उचित होगा और न ही इसे आम आदमी के लिए तत्काल आर्थिक लाभ की योजना मानना।
यह एक अंतरराष्ट्रीय नीति-दिशा है।
इसमें व्यापार, भुगतान, कृषि, AI, ऊर्जा, वित्त और वैश्विक शासन में सहयोग की संभावनाएं हैं। लेकिन इन संभावनाओं को नागरिक के वास्तविक लाभ में बदलने की जिम्मेदारी अब भारत की घरेलू नीतियों और उनके क्रियान्वयन पर होगी।
BRICS भारत को बाजार दे सकता है।
लेकिन बाजार का लाभ किसे मिलेगा, यह सरकार की नीतियां तय करेंगी।
BRICS तकनीक दे सकता है।
लेकिन उससे रोजगार बनेगा या रोजगार घटेगा, यह हमारी शिक्षा और skill policy तय करेगी।
BRICS कृषि सहयोग दे सकता है।
लेकिन किसान की आय कितनी बढ़ेगी, यह भारत की कृषि नीति, बाजार व्यवस्था और मूल्य समर्थन तय करेंगे।
BRICS व्यापार बढ़ा सकता है।
लेकिन उससे पैदा हुई संपत्ति समाज के कितने हिस्से तक पहुंचेगी, यह सबसे बड़ा राजनीतिक और आर्थिक सवाल रहेगा।
इसलिए New Delhi Declaration पर जश्न मनाने के साथ एक सवाल पूछना भी जरूरी है—
दुनिया के मंच पर भारत की आवाज मजबूत हुई, यह अच्छी बात है।
लेकिन भारत के गांव, खेत, दुकान और नौकरी तलाशते युवा की आवाज कितनी मजबूत होगी?
क्योंकि किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते की अंतिम सफलता सम्मेलन कक्ष में नहीं, आम नागरिक के जीवन में दिखाई देती है।












