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सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल पहुंचे दर्शन करने, सेवा पखवाड़ा के अंतर्गत किया वृक्षारोपण

बड़वाह। The India Speaks Desk
शारदीय नवरात्र का पावन पर्व पूरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा है। इसी कड़ी में बड़वाह स्थित प्राचीन जयंती माता मंदिर में नवरात्र के पांचवें दिन भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का आना-जाना जारी रहा। माता के जयकारों और भजन-कीर्तन से पूरा माहौल भक्तिमय बन गया।


भक्तों की उमंग और आस्था

दूर-दराज़ के गांवों और कस्बों से हजारों की संख्या में भक्त माता के दर्शन के लिए पहुंचे। श्रद्धालुओं का मानना है कि जयंती माता के दरबार में मन से की गई प्रार्थना अवश्य फल देती है। इसी आस्था के चलते नवरात्र में यहां भारी भीड़ उमड़ती है। मंदिर परिसर में भक्तों ने मां की आरती और पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना की।


सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल का आगमन

इस मौके पर क्षेत्रीय सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल भी जयंती माता मंदिर पहुंचे और विधिवत पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लिया। उन्होंने मंदिर में पहुंचकर कहा कि नवरात्र का पर्व नारी शक्ति और धर्म की विजय का प्रतीक है। इसके बाद उन्होंने सेवा पखवाड़ा के अंतर्गत नगर वन में वृक्षारोपण कार्यक्रम में भाग लिया और लोगों से अधिक से अधिक वृक्ष लगाने की अपील की।


मंदिर का इतिहास और महत्व

बड़वाह का जयंती माता मंदिर करीब 500–600 साल पुराना है। 15वीं–16वीं शताब्दी में तोमर वंश के राजा राणा हमीरसिंह ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। उन्होंने जैतगढ़ किले के समीप विंध्याचल की पहाड़ियों में एक गुफा के भीतर अपनी कुलदेवी जयंती माता की स्थापना की।

माता की प्रतिमा आज भी अपने प्राचीन स्वरूप में मौजूद है। देवी कमल पर पद्मासन में विराजमान हैं और उनकी चार भुजाओं में तलवार, ढाल, खप्पर और पाश हैं। यह स्वरूप शक्ति और रक्षा का प्रतीक माना जाता है।


मंदिर की विशेषताएं

स्थापना का समय: 15वीं–16वीं शताब्दी (लगभग 500–600 वर्ष पूर्व)

निर्माता: राजा राणा हमीरसिंह (तोमर वंश)

स्थान: बड़वाह, जैतगढ़ किला परिसर, चोरल नदी के किनारे स्थित पहाड़ी गुफा

उद्देश्य: अपनी कुलदेवी जयंती माता की स्थापना और आराधना


धार्मिक पर्यटन का केंद्र

जयंती माता मंदिर न केवल स्थानीय लोगों के लिए बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए आस्था का केंद्र है। नवरात्र के दिनों में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं, जिससे बड़वाह क्षेत्र का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व और भी बढ़ जाता है।

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