परमिशन बिना वास्तविक जाँच? स्थानीय लोग बोले—“पूरी पहाड़ी ही गायब हो गई”
बड़वाह। The India Speaks Desk
बड़वाह के ग्राम उमरिया में खसरा नंबर 231 की निजी भूमि पर मौजूद करीब 50–70 फीट ऊँची बड़ी पहाड़ी को खनिज विभाग द्वारा कथित तौर पर समतलीकरण योग्य भूमि बताते हुए मुरूम उत्खनन और परिवहन की अनुमति दे दी गई।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस पहाड़ी पर हज़ारों सागौन के पेड़ मौजूद थे, लेकिन बिना किसी आधिकारिक बोर्ड, निशान, सर्वे विवरण या पेड़ गणना रिपोर्ट के ही पहाड़ी का बड़े पैमाने पर कटाव शुरू कर दिया गया।
स्थानीय शिकायतें: “अनुमति देने से पहले पेड़ों और पहाड़ी की वास्तविक स्थिति क्यों नहीं देखी गई?”


ग्राम उमरिया के ग्रामीणों ने बताया कि यह पहाड़ी वर्षों से वन जैसी स्थिति में मौजूद थी। पेड़ों की घनत्व इतनी थी कि क्षेत्र को मिनी फ़ॉरेस्ट ज़ोन की तरह जाना जाता था।
ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि—
क्या खनिज विभाग ने पेड़ों की संख्या जाँची?
क्या पर्यावरणीय प्रभाव का आंकलन हुआ?
क्या 70 फीट ऊँची पहाड़ी वास्तव में समतलीकरण योग्य भूमि थी?
क्या निजी भूमि होने के चलते विभाग ने सतही रिपोर्ट पर ही भरोसा कर लिया?
जाँच अधिकारी ने पहाड़ी को ‘समतलीकरण योग्य’ बताया — खनिज अधिकारी ने दी सफ़ाई
मामले को लेकर जब जयस बड़वाह के प्रभारी श्री चेतन मंडलोई ने खनिज अधिकारी श्री सावन चौहान से बात की, तो खनिज अधिकारी ने कहा—
“हमने विभाग से जाँच अधिकारी भेजे थे। उन्होंने इस भूमि को समतलीकरण योग्य बताया था। उसी रिपोर्ट के आधार पर परमिशन जारी की गई।”
हालाँकि मौके पर न तो किसी जांच रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध कराई गई और न ही किसी प्रकार का अधिकृत बोर्ड लगाया गया, जिससे परमिशन, शर्तें, उत्खनन क्षेत्र और परिवहन सीमा की जानकारी मिल सके।
निजी भूमि, लेकिन नियमों से परे? भूमि मालिक की भूमिका पर भी उठे सवाल
यह भूमि पूरी तरह निजी है, और ग्रामीणों में इस बात की आशंका है कि इस पूरे मामले में भूमि मालिक की भी भूमिका हो सकती है।
स्थानीय लोगों की मांग है कि—
खनिज विभाग ने किस आधार पर पहाड़ी को समतलीकरण योग्य माना?
क्या पेड़ों का संरक्षित वन क्षेत्र निर्धारण किया गया था?
क्या वास्तविक स्थल निरीक्षण हुआ था या केवल कागज़ी निरीक्षण?












