जब देश बेरोजगारी गिन रहा था, तब टीवी स्टूडियो “गिफ्ट डिप्लोमेसी” में व्यस्त थे
संपादक लोकेश कोचले । The India Speaks
भारत आज एक अजीब दौर से गुजर रहा है। एक तरफ करोड़ों युवा नौकरी, परीक्षा, पेपर लीक और महंगाई से जूझ रहे हैं, दूसरी तरफ देश का बड़ा मीडिया वर्ग कैमरे की चमक में “विश्वगुरु विजुअल्स” बेचने में लगा हुआ दिखाई देता है। ऐसा लगता है जैसे न्यूज़रूम अब लोकतंत्र के प्रहरी नहीं, बल्कि इवेंट मैनेजमेंट कंपनियां बन चुके हैं।
विपक्ष सवाल सरकार से पूछता है, और दर्द मीडिया को होता हैं
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी लगातार बड़े आरोप लगाते हैं — कॉर्पोरेट गठजोड़, विदेश नीति पर दबाव, संस्थाओं की निष्पक्षता, अडानी विवाद, बेरोजगारी और आर्थिक संकट। सामान्य लोकतंत्र में ऐसे आरोपों पर मीडिया महीनों तक जांच करती, दस्तावेज खंगालती, सत्ता से जवाब मांगती। लेकिन भारत में अक्सर होता इसका उल्टा है।
टीवी एंकर चीखते जरूर हैं, लेकिन सवाल सत्ता से कम और विपक्ष से ज्यादा पूछे जाते हैं।
अगर विपक्ष सवाल उठाए तो उसे “नकारात्मक राजनीति” कहा जाता है, लेकिन अगर सरकार फोटोशूट करे तो उसे “वैश्विक नेतृत्व” घोषित कर दिया जाता है।
न्यूज़रूम या भक्तिकाल?
आज का बड़ा हिस्सा “राष्ट्रवाद” और “लीडर ब्रांडिंग” के बीच कहीं खो गया है। ऐसा लगता है कि पत्रकारिता अब सत्ता की निगरानी नहीं बल्कि उसकी मार्केटिंग का माध्यम बनती जा रही है।
देश में युवा पूछ रहा है:
- नौकरी कहां है?
- पेपर लीक क्यों नहीं रुक रहे?
- महंगाई लगातार क्यों बढ़ रही?
- छोटे व्यापार क्यों टूट रहे?
- मीडिया इन मुद्दों पर रोज बहस क्यों नहीं करती?
लेकिन प्राइम टाइम पर बहस होती है:
- किस नेता ने किसे क्या गिफ्ट दिया?
- किस विदेशी नेता ने किसे गले लगाया?
- कौन “एंटी-नेशनल” है?
- कौन ज्यादा देशभक्त दिख रहा है?
बेरोजगारी की लाइनें लंबी, लेकिन कैमरा कहीं और
देश का युवा आज डिग्री लेकर भटक रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं में वर्षों की मेहनत पेपर लीक में खत्म हो जाती है। लाखों पद खाली हैं लेकिन भर्ती धीमी है। छोटे शहरों का मध्यम वर्ग EMI, फीस और महंगाई के दबाव में टूट रहा है।
लेकिन इन दर्दों की TRP शायद कम है।
क्योंकि बेरोजगार युवक का इंटरव्यू बेचने से ज्यादा आसान है स्टूडियो में चीखती बहस कराना।
आर्थिक संकट की गहराई दिखाने से ज्यादा सरल है राष्ट्रवादी संगीत के साथ “ऐतिहासिक विजिट” चलाना।
क्या मीडिया डरती है?
यह सवाल अब खुलकर पूछा जा रहा है।
क्या बड़े मीडिया संस्थान सरकार से टकराने से बचते हैं?
क्या विज्ञापन, लाइसेंस, ED, IT और राजनीतिक दबावों का असर संपादकीय फैसलों पर पड़ता है?
क्या कॉर्पोरेट मालिकाना ढांचा पत्रकारिता की स्वतंत्रता को सीमित कर रहा है?
शायद यही कारण है कि सत्ता पर कठोर सवाल पूछने वाले पत्रकार धीरे-धीरे स्क्रीन से गायब होते गए और उनकी जगह “सरकारी नैरेटिव मैनेजर्स” दिखाई देने लगे।
लोकतंत्र का असली संकट
लोकतंत्र सिर्फ चुनाव से नहीं चलता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब:
- मीडिया सत्ता से सवाल पूछे,
- विपक्ष को गंभीरता से सुना जाए,
- जनता को तथ्य आधारित बहस मिले,
- और पत्रकार सत्ता के साथ मंच साझा करने के बजाय जनता की आवाज बनें।
अगर मीडिया सिर्फ सरकार की उपलब्धियों का प्रसारण केंद्र बन जाए और जनता की समस्याओं को “नेगेटिविटी” कहकर दबा दिया जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे सूचना-प्रबंधन तंत्र में बदलने लगता है।
सवाल सिर्फ राहुल गांधी का नहीं, लोकतंत्र का है
राहुल गांधी सही हैं या गलत — यह लोकतांत्रिक बहस का विषय हो सकता है। लेकिन किसी भी विपक्षी आवाज को लगातार हल्का दिखाना, मजाक में बदल देना या अनदेखा करना लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं माना जा सकता।
क्योंकि जब मीडिया सवाल पूछना छोड़ देती है, तब जनता धीरे-धीरे सच सुनना भी छोड़ देती है।












