📢 अपने क्षेत्र से जुड़ी भ्रष्टाचार की खबरे या विज्ञापन देने के लिए संपर्क करे
📞 7772828778 | 📩 Email: editor@theindiaspeaks.com

पुणे कोर्ट में सावरकर के परिजन का बड़ा स्वीकारोक्ति बयान, स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास पर फिर उठे सवाल

पुणे। लोकेश कोचले| The India Speaks

विनायक दामोदर सावरकर की छवि को लेकर देश में दशकों से चल रही बहस को उस समय नया मोड़ मिल गया, जब स्वयं उनके परिजन सात्यकि सावरकर ने पुणे की विशेष अदालत में स्वीकार किया कि विनायक दामोदर सावरकर ने ब्रिटिश हुकूमत के सामने केवल 5 नहीं बल्कि 10 बार दया याचिकाएं (Mercy Petitions) दायर की थीं। इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक एक बार फिर सावरकर की भूमिका और उनके स्वतंत्रता संग्राम में योगदान पर तीखी बहस छिड़ गई है।

राहुल गांधी के खिलाफ दायर मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान हुई जिरह में सात्यकि सावरकर ने अदालत के सामने माना कि सावरकर द्वारा दायर की गई 10 दया याचिकाओं का रिकॉर्ड सरकारी अभिलेखों में मौजूद है। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे पहले सार्वजनिक बहस में अक्सर 5 दया याचिकाओं का ही उल्लेख किया जाता रहा है।

अदालत में और क्या-क्या स्वीकार किया गया?

जिरह के दौरान सात्यकि सावरकर ने यह भी स्वीकार किया कि क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त और अशफाक उल्ला खान जैसे कई स्वतंत्रता सेनानियों ने ब्रिटिश सरकार के सामने दया याचिकाएं दायर नहीं की थीं। उन्होंने यह भी माना कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त अपने विचारों और सिद्धांतों पर अंत तक अडिग रहे।

इतना ही नहीं, अदालत में यह भी सामने आया कि सावरकर ने सजा सुनाए जाने के एक महीने के भीतर ही पहली दया याचिका दायर कर दी थी।

समर्थक और विरोधी आमने-सामने

सावरकर समर्थकों का कहना है कि दया याचिकाएं आत्मसमर्पण नहीं थीं, बल्कि जेल से बाहर निकलकर राष्ट्रवादी गतिविधियों को जारी रखने की रणनीति थीं। उनका तर्क है कि उस दौर में दया याचिका देना एक कानूनी प्रक्रिया थी और कई कैदियों ने इसका उपयोग किया था।

वहीं आलोचकों का कहना है कि जब अन्य कई क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया, तब बार-बार दया याचिकाएं दायर करना स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी परंपरा से अलग रुख दर्शाता है। उनका आरोप है कि वर्षों से जिस तथ्य को दबाने या सीमित रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई, वह अब अदालत में दर्ज बयान के जरिए सामने आ गया है।

इतिहास की बहस फिर केंद्र में

सात्यकि सावरकर के इस बयान ने एक बार फिर उस ऐतिहासिक प्रश्न को जीवित कर दिया है कि क्या दया याचिकाएं रणनीतिक कदम थीं या ब्रिटिश शासन से राहत पाने का प्रयास? इसका अंतिम निर्णय इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के बीच बहस का विषय बना हुआ है, लेकिन इतना निश्चित है कि अदालत में दर्ज इस बयान ने राजनीतिक और वैचारिक विमर्श को नई ऊर्जा दे दी है।

अब सवाल यह है कि जब स्वयं सावरकर परिवार का सदस्य 10 दया याचिकाओं की बात स्वीकार कर रहा है, तो क्या आने वाले दिनों में सावरकर को लेकर स्थापित राजनीतिक नैरेटिव में बदलाव देखने को मिलेगा? देश की नजरें अब इस बहुचर्चित मामले की अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

ASUS Vivobook Laptop Buy Now

You missed

📢 The India Speaks में रिपोर्टर भर्ती शुरू!

क्या आपके पास खबरों की समझ है? क्या आप अपने क्षेत्र की सच्चाई सामने लाना चाहते हैं?

🔍 The India Speaks अपने नेटवर्क के विस्तार के लिए स्थानीय रिपोर्टर नियुक्त कर रहा है।

✍️ ज़िम्मेदारियां:

✅ पात्रता:

💼 लाभ:

📲 आवेदन करें:

📧 ईमेल: editor@theindiaspeaks.com
📞 मोबाइल: 7772828778

⚠️ यह भर्ती केवल गंभीर और ज़िम्मेदार अभ्यर्थियों के लिए है। स्थान सीमित हैं।