खरगोन। लोकेश कोचले। The India Speaks Desk
सरकार ने किसानों के लिए उर्वरक खरीद प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से ई-विकास 2.0 लागू किया है। शासन की ओर से जारी जानकारी में इसे किसान हितैषी बदलाव बताया गया है। टोकन व्यवस्था में सुधार से लेकर WhatsApp Bot के जरिए टोकन जनरेट करने और उर्वरक से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराने जैसी सुविधाओं का उल्लेख किया गया है।
लेकिन इस डिजिटल व्यवस्था के बीच एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—क्या जिले का हर किसान स्मार्टफोन, इंटरनेट और WhatsApp का इस्तेमाल करना जानता है?
WhatsApp Bot सुविधा, लेकिन जिनके पास WhatsApp ही नहीं उनका क्या?
खरगोन जिले में ऐसे अनेक किसान हैं जो स्मार्टफोन का इस्तेमाल नहीं करते या डिजिटल सेवाओं के संचालन से परिचित नहीं हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी भी एक व्यावहारिक चुनौती बनी रहती है। ऐसे में ई-विकास 2.0 की डिजिटल सुविधाएं वास्तव में हर किसान तक कैसे पहुंचेंगी, यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है।
सरकार जल्द ही WhatsApp Bot के माध्यम से टोकन जनरेट करने की सुविधा शुरू करने जा रही है। किसान WhatsApp पर HELP/मदद लिखकर टोकन, रिटेलर, उर्वरक, उठाव की तारीख और टोकन की वैधता जैसी जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।
सुविधा सुनने में आसान जरूर है, लेकिन सवाल यह है कि जिस किसान के पास स्मार्टफोन नहीं है, जिसके मोबाइल में इंटरनेट नहीं है या जिसे WhatsApp चलाना नहीं आता, वह इस व्यवस्था का लाभ कैसे उठाएगा?
खासकर बुजुर्ग किसान और वे छोटे किसान जो डिजिटल तकनीक से परिचित नहीं हैं, उनके लिए यह व्यवस्था कितनी आसान होगी, इस पर प्रशासन को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
डिजिटल व्यवस्था के साथ ऑफलाइन विकल्प की जरूरत
किसानों को डिजिटल सुविधा उपलब्ध कराना अच्छी पहल है, लेकिन इसके साथ ऐसे किसानों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था भी जरूरी है जो डिजिटल माध्यम का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
क्या पैक्स, डबल लॉक केंद्रों या कृषि विभाग के कार्यालयों में किसानों की सहायता के लिए कोई हेल्प डेस्क या कर्मचारी उपलब्ध रहेगा? क्या किसान वहां जाकर स्वयं टोकन बनवा सकेंगे? यदि किसान को ऑनलाइन प्रक्रिया समझ नहीं आती तो उसकी सहायता की जिम्मेदारी किसकी होगी?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
कहीं डिजिटल सुविधा बिचौलियों की मजबूरी न बन जाए
यदि किसान खुद ऑनलाइन टोकन नहीं बना पाए और उसे हर बार किसी दूसरे व्यक्ति की मदद लेनी पड़े, तो डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति में किसान को टोकन बनवाने के लिए साइबर कैफे, मोबाइल दुकान या किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर होना पड़ सकता है। इससे न केवल किसान का अतिरिक्त समय और पैसा खर्च होगा, बल्कि ऐसी व्यवस्था में बिचौलियों की भूमिका बढ़ने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
इसलिए प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि डिजिटल प्रक्रिया किसान की सुविधा बने, उसकी मजबूरी नहीं।
नेटवर्क और डिजिटल साक्षरता भी बड़ी चुनौती
ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट की उपलब्धता हर स्थान पर समान नहीं है। इसके अलावा डिजिटल साक्षरता भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।
सरकार ने ई-विकास 2.0 में टोकन, मोबाइल सेवा और WhatsApp Bot जैसी सुविधाओं का विस्तार किया है, लेकिन इन सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए किसान के पास मोबाइल, इंटरनेट, डिजिटल जानकारी और तकनीकी समझ होना आवश्यक है।
ऐसे में केवल डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार कर देना पर्याप्त नहीं होगा। उसकी पहुंच उस किसान तक भी सुनिश्चित करनी होगी जो तकनीक से दूर है।
प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए वैकल्पिक व्यवस्था
ई-विकास 2.0 के तहत किसानों को बेहतर सुविधा देने का दावा किया गया है। अब प्रशासन के सामने असली चुनौती यह है कि इस व्यवस्था में डिजिटल रूप से सक्षम किसान के साथ-साथ डिजिटल रूप से वंचित किसान भी पीछे न छूटे।
प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि बिना स्मार्टफोन वाले किसान टोकन कैसे प्राप्त करेंगे, WhatsApp नहीं चलाने वाले किसानों को जानकारी कैसे मिलेगी और इंटरनेट या नेटवर्क की समस्या होने पर उर्वरक खरीद की प्रक्रिया किस वैकल्पिक माध्यम से पूरी होगी।
किसान के हाथ में स्मार्टफोन होना जरूरी नहीं, उसके खेत में खाद पहुंचना जरूरी है। ई-विकास 2.0 की सफलता का असली पैमाना यही होना चाहिए कि तकनीक की सुविधा अंतिम पंक्ति के किसान तक बिना किसी अतिरिक्त परेशानी और बिचौलिए के पहुंचे।












