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निमाड़ का अनोखा मंदिर, जहां पुरुष रूप में विराजमान हैं नागदेवता; च्यवन ऋषि की तपस्या से भी जुड़ी है मान्यतानागपंचमी पर सुरतीपुरा तालाब मंदिर में उमड़ेगा आस्था का सैलाब

बड़वाह। ( सुनील परिहार)

नागपंचमी के अवसर पर बड़वाह के समीप घने जंगलों के बीच स्थित सुरतीपुरा तालाब मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने की उम्मीद है। प्राकृतिक हरियाली और पानी से घिरे इस प्राचीन मंदिर में नागदेवता की प्रतिमा पुरुष रूप में विराजमान है। स्थानीय मान्यता के अनुसार निमाड़ क्षेत्र में यह ऐसा अनोखा मंदिर है, जहां नागदेवता की पुरुष स्वरूप में पूजा-अर्चना की जाती है।
नागपंचमी के दिन मंदिर परिसर में एक दिवसीय मेले का आयोजन भी होता है। आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के साथ ही दूर-दराज से श्रद्धालु यहां पहुंचकर नागदेवता के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं। वैसे मंदिर में वर्षभर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन नागपंचमी पर यहां दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है।

पांडवों और च्यवन ऋषि से जुड़ी हैं मान्यताएं

मंदिर को लेकर क्षेत्र में कई प्राचीन लोक मान्यताएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि द्वापर युग में वनवास के दौरान पांडवों ने इस क्षेत्र के जंगलों में समय बिताया था। अपनी रक्षा के लिए उन्होंने यहां नागदेवता की स्थापना की थी। इसी कारण यह स्थान आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
इस मंदिर की सबसे रोचक मान्यता महर्षि च्यवन से जुड़ी है। लोककथा के अनुसार च्यवन ऋषि अपने साधनाकाल में इसी क्षेत्र में तपस्या कर रहे थे। लंबे समय तक तपस्या में लीन रहने के कारण उनके शरीर के चारों ओर दीमकों ने बांबी बना ली थी। बांबी के दो छिद्रों से प्रकाश दिखाई देता था।
इसी दौरान एक राजा अपने परिवार के साथ जंगल में आया। राजा की पुत्री ने बांबी से निकल रहे प्रकाश को देखकर उत्सुकतावश उसमें लकड़ी डाल दी, जो च्यवन ऋषि की आंख में जा लगी। इससे बांबी से रक्त निकलने लगा और ऋषि का ध्यान भंग हो गया।

इसी कथा से जुड़ा है च्यवनप्राश का प्रसंग

मान्यता है कि घटना से नाराज च्यवन ऋषि राजा को श्राप देने के लिए उद्यत हुए। राजा ने अपनी पुत्री के अपराध के लिए क्षमा मांगी और ऋषि से उसका विवाह करने का आग्रह किया। ऋषि ने अपने वृद्ध एवं जर्जर शरीर का हवाला दिया, लेकिन राजा अपनी बात पर अडिग रहा।
इसके बाद लोकमान्यता के अनुसार च्यवन ऋषि ने ऐसी औषधि तैयार की, जिसके सेवन से उनके शरीर का कायाकल्प हुआ। यही औषधि आगे चलकर च्यवनप्राश के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसके बाद उन्होंने राजा की पुत्री से विवाह किया।

नागदेवता के पुरुष स्वरूप की पूजा

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस पूरी घटना के बाद यहां नागदेवता पुरुष रूप में स्थापित हुए और तभी से उनकी पूजा की जा रही है। मंदिर का उल्लेख नर्मदा पुराण से जुड़े स्थानीय धार्मिक संदर्भों में भी बताया जाता है। हालांकि इन कथाओं को स्थानीय धार्मिक एवं लोक मान्यताओं के रूप में ही देखा जाता है।
प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे सुरतीपुरा तालाब का यह मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था, विश्वास और शांति का केंद्र है। नागपंचमी पर एक बार फिर यहां भक्तों का तांता लगने और पूरा परिसर भोलेनाथ व नागदेवता के जयकारों से गूंजने की उम्मीद है।

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