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भोपाल | द इंडिया स्पीक्स डेस्क

मध्यप्रदेश में सरकारी सिस्टम की डिजिटल चमक के पीछे अगर सत्यापन की हकीकत देखनी हो तो नर्सिंग रजिस्ट्रेशन का यह मामला काफी है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि एक गधे की तस्वीर लगाकर आवेदन कैसे आगे बढ़ गया, सवाल यह है कि जिस व्यवस्था को इंसानी पहचान, शैक्षणिक योग्यता और जरूरी दस्तावेजों की जांच करनी थी, वह इतनी आसानी से फर्जी जानकारी को शुरुआती स्तर पर रोक क्यों नहीं पाई?

मध्यप्रदेश नर्सेस रजिस्ट्रेशन काउंसिल के ऑनलाइन पोर्टल पर एक ऐसा आवेदन पहुंचा, जिसमें आवेदक का नाम ‘Donkey’, पिता का नाम ‘Donkey Father’ और जाति ‘Animal’ लिखी गई। तस्वीर भी इंसान की नहीं, गधे की लगाई गई। इसके बावजूद आवेदन प्रक्रिया आगे बढ़ी और 25 सितंबर को ‘Donkey MPNRC’ के नाम से प्रोविजनल रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट जनरेट हो गया।

जिस सिस्टम को इंसान पहचानना था, वह ‘Donkey’ भी नहीं पहचान पाया?

यह आवेदन NSUI के प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार द्वारा सिस्टम की जांच के लिए टेस्ट के तौर पर किए जाने की बात सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक आवेदन में काल्पनिक व्यक्तिगत जानकारी के साथ नर्सिंग शिक्षा से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की गई और फीस जमा करने के बाद डिजिटल प्रमाणपत्र जनरेट हो गया। प्रमाणपत्र में आवेदक को ‘Registered Nurse and Registered Midwife’ के रूप में दर्ज किया गया तथा बीएससी नर्सिंग प्रशिक्षण से जुड़ी जानकारी भी दिखाई गई।

यानी मामला सिर्फ एक गलत नाम का नहीं है। सवाल उस पूरी प्रक्रिया पर है जिसमें पहचान, फोटो, शैक्षणिक योग्यता और दस्तावेजों की विश्वसनीयता जैसी बुनियादी चीजों की जांच आखिर किस चरण में होती है?

अगर आवेदन में ही ‘Donkey’, ‘Donkey Father’ और ‘Animal’ जैसे विवरण मौजूद हों, तो डिजिटल व्यवस्था की पहली दीवार पर ही सवाल खड़ा होता है।

सरकारें अक्सर डिजिटल सिस्टम को पारदर्शिता और तेजी का प्रतीक बताती हैं। लेकिन यह मामला याद दिलाता है कि कागज कम करने से व्यवस्था आधुनिक नहीं होती, सत्यापन मजबूत करने से होती है।

परिषद ने कहा—यह प्रोविजनल रजिस्ट्रेशन था, सत्यापन अभी बाकी था

मध्यप्रदेश नर्सेस रजिस्ट्रेशन काउंसिल की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि जारी हुआ प्रमाणपत्र प्रोविजनल था और अंतिम सत्यापन की प्रक्रिया अलग है। परिषद के अनुसार गलत जानकारी या फर्जी दस्तावेज सामने आने पर रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकता है। मामले के बाद ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को अस्थायी रूप से रोककर अतिरिक्त सुरक्षा उपायों पर काम किए जाने की बात भी सामने आई है।

लेकिन यहीं सबसे बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—अगर सत्यापन बाद में होना है तो शुरुआती स्तर पर इतनी स्पष्ट रूप से संदिग्ध जानकारी को सिस्टम आगे बढ़ने से क्यों नहीं रोक पाया?

नर्सिंग जैसे क्षेत्र में यह सवाल महज तकनीकी गलती तक सीमित नहीं रहता। जिस पंजीयन व्यवस्था का उद्देश्य योग्य स्वास्थ्यकर्मियों की पहचान सुनिश्चित करना है, उसमें सत्यापन की मजबूती सीधे मरीजों की सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ी है।

डिजिटल पोर्टल बना, लेकिन सवाल पुराने ही रह गए

ऑनलाइन व्यवस्था शुरू करने का उद्देश्य कागजी प्रक्रिया कम करना और पंजीयन प्रक्रिया को सरल बनाना हो सकता है। लेकिन डिजिटल पोर्टल तभी भरोसेमंद माना जाएगा जब वह फर्जी पहचान और संदिग्ध दस्तावेजों को शुरुआती स्तर पर पकड़ने की क्षमता भी रखे।

इस पूरे प्रकरण ने व्यवस्था के सामने एक असहज सवाल रख दिया है—क्या हमने सिस्टम को सिर्फ ऑनलाइन किया है या वास्तव में स्मार्ट भी बनाया है?

गधे की तस्वीर वाला आवेदन अपने आप में भले ही हास्यास्पद लगे, लेकिन उसके पीछे छिपा सवाल बेहद गंभीर है। क्योंकि असली चुनौती यह नहीं कि ‘Donkey’ के नाम प्रमाणपत्र कैसे बना; चुनौती यह है कि अगर कोई वास्तविक फर्जी आवेदक इसी सिस्टम में प्रवेश करे और उसके पास थोड़ी अधिक चालाकी हो, तो क्या व्यवस्था उसे भी पकड़ पाएगी?

सरकार और संबंधित परिषद के लिए इस घटना का सबसे अहम पहलू यही होना चाहिए कि गलती किस स्तर पर हुई, कौन-से सत्यापन नहीं हुए और भविष्य में ऐसा आवेदन दोबारा सिस्टम की शुरुआती जांच से कैसे नहीं निकल पाएगा।

क्योंकि स्वास्थ्य व्यवस्था में प्रमाणपत्र सिर्फ एक डिजिटल कागज नहीं होता—उसके पीछे मरीज का भरोसा जुड़ा होता है।

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