बड़वाह विधायक सचिन बिरला जल संरक्षण का दे रहे संदेश, लेकिन उनकी ही विधानसभा में शराब कंपनी पर नर्मदा प्रदूषण के आरोप
बड़वाह। The India Speaks Desk
एक ओर मध्यप्रदेश सरकार “जल गंगा संवर्धन अभियान” के तहत नदियों और जल स्रोतों को बचाने का संदेश दे रही है, वहीं दूसरी ओर बड़वाह विधानसभा के ग्राम खोड़ी में स्थित शराब कंपनी पर लगातार दूषित जल छोड़कर नर्मदा नदी को प्रदूषित करने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। इस पूरे मामले ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
गौरतलब है कि बड़वाह विधायक सचिन बिरला ने हाल ही में अपने आधिकारिक फेसबुक पेज पर जल संरक्षण और नदी सफाई अभियान को लेकर पोस्ट साझा करते हुए लिखा कि:
“जल ही जीवन है और जल है तो कल है, इसलिए जल की हर एक बूंद का संवर्धन और संरक्षण हमारा सर्वोपरि कर्त्तव्य है…”
उन्होंने आगे लिखा कि जल संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं बल्कि जनभागीदारी से जुड़ा सामाजिक अभियान है और लोगों से पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील भी की।
खोड़ी की शराब कंपनी पर फिर गंभीर आरोप


इसी बीच बड़वाह विधानसभा के ग्राम खोड़ी में स्थित शराब कंपनी एसोसिएटेड अल्कोहल एंड ब्रेवरीज लिमिटेड पर आरोप है कि कंपनी लगातार गंदा और दूषित जल बाहर छोड़ रही है। ग्रामीणों और किसानों का दावा है कि यह दूषित पानी नालों के माध्यम से बहते हुए मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा नदी तक पहुंच रहा है।
स्थानीय किसानों का कहना है कि गंदे पानी के कारण खेतों की फसलें प्रभावित हो रही हैं। वहीं आसपास के ग्रामीण गंदगी, बदबू, मक्खियों और मच्छरों से परेशान हैं। कई ग्रामीणों ने प्रशासन को लिखित शिकायतें भी दी हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है।
“जल बचाओ” अभियान और जमीनी हकीकत पर सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि एक तरफ जनता को जल संरक्षण का संदेश दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ कथित रूप से खुलेआम प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही।
“यदि नर्मदा और जल स्रोतों को बचाना प्राथमिकता है, तो फिर दूषित पानी छोड़ने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं?” — स्थानीय ग्रामीण
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका पर भी उठे सवाल
इतने गंभीर आरोपों के बावजूद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि शिकायतों के बाद भी हर बार मामले को औपचारिक जांच तक सीमित कर दिया जाता है।
अब देखना होगा कि जल संरक्षण के बड़े दावों के बीच प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस मामले में वास्तव में कोई कठोर कदम उठाते हैं या नहीं।












