बिना स्वीकृति संरक्षित परिसर का ताला तोड़कर प्रतिमाएं हटाने के आरोप, पुरातत्व विभाग के बयानों में भी दिखा विरोधाभास
ओंकारेश्वर। The India Speaks Desk
सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के बीच ओंकारेश्वर में प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर नया विवाद सामने आया है। आरोप है कि ममलेश्वर मंदिर परिसर के समीप स्थित एक संरक्षित मंदिर में रखी पुरातात्विक महत्व की प्राचीन प्रतिमाओं को पुरातत्व विभाग की औपचारिक स्वीकृति के बिना हटाया गया। इस कार्रवाई के बाद प्रशासन और पुरातत्व विभाग दोनों की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार रविवार सुबह पुनासा एसडीएम पंकज वर्मा प्रशासनिक अमले के साथ ममलेश्वर परिसर पहुंचे और संबंधित संरक्षित स्थल का ताला खुलवाकर वहां रखी गई प्राचीन प्रतिमाओं को बाहर निकलवाया। बाद में इन प्रतिमाओं को एक टिन शेड में रखवाया गया। प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि पूरी प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता दिखाई नहीं दी, जिससे स्थानीय स्तर पर असंतोष और आशंकाएं बढ़ गई हैं।
धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व से जुड़ा मामला
जानकारी के अनुसार मंदिर परिसर में रखी प्रतिमाएं सैकड़ों वर्ष पुरानी बताई जा रही हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि ये प्रतिमाएं भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूपों से संबंधित हैं तथा उनका धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। ऐसे में बिना विधिवत स्वीकृति और निर्धारित प्रक्रिया के इन्हें हटाया जाना गंभीर विषय माना जा रहा है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि संरक्षित धरोहरों से जुड़ी किसी भी कार्रवाई में पुरातत्व विभाग की स्पष्ट अनुमति और तकनीकी निगरानी आवश्यक होती है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की मांग भी उठने लगी है।


पुरातत्व विभाग के बयान से बढ़ा विवाद
मामले में पुरातत्व विभाग के सहायक संरक्षक विपुल मेश्राम का बयान भी चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रारंभिक जानकारी में उन्होंने प्रतिमाओं को बिना स्वीकृति हटाने को अवैधानिक बताते हुए कार्रवाई की बात कही थी। बाद में प्रतिमाओं को सहमति से हटाए जाने संबंधी जानकारी सामने आने से विभाग के रुख को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
“प्रशासन ने पत्र भेजा था, किंतु उसकी स्वीकृति विभाग द्वारा अभी नहीं दी गई थी। बिना स्वीकृति मूर्तियां हटाना अवैधानिक है और इस संबंध में कार्रवाई होगी।”
— विपुल मेश्राम, सहायक संरक्षक, पुरातत्व विभाग, बुरहानपुर
जांच और कार्रवाई पर टिकी नजर
नगरवासियों का कहना है कि यदि किसी आम नागरिक द्वारा संरक्षित परिसर का ताला तोड़कर पुरातात्विक महत्व की सामग्री हटाई जाती तो तत्काल कानूनी कार्रवाई होती। ऐसे में प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही और नियमों के पालन को लेकर भी प्रश्न उठ रहे हैं।
फिलहाल मामले की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को भेजे जाने की बात सामने आई है। अब सभी की नजर इस मामले में होने वाली जांच और संभावित प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हुई है।












