पर्यावरण, विकास और कॉरपोरेट विस्तार के बीच फंसा भारत का हरित भविष्य
भारत । The India Speaks Desk
देश में इन दिनों “एक पेड़ मां के नाम” अभियान बड़े स्तर पर चलाया जा रहा है। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक और सरकारी अधिकारी तक पेड़ लगाते हुए तस्वीरें साझा कर रहे हैं। करोड़ों पौधे लगाने के दावे किए जा रहे हैं। संदेश साफ है—पर्यावरण बचाइए, धरती को हरा-भरा बनाइए।
लेकिन इसी समय देश के कई हिस्सों से ऐसी खबरें भी सामने आ रही हैं जहां खनन, बिजली परियोजनाओं, बंदरगाहों, ट्रांसमिशन लाइनों और औद्योगिक विस्तार के लिए हजारों-लाखों पेड़ों की कटाई की जा रही है। इन विवादों में सबसे अधिक चर्चा अक्सर अदाणी समूह की परियोजनाओं को लेकर होती रही है।
यही विरोधाभास आज सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ा है—क्या हम एक हाथ से पौधे लगा रहे हैं और दूसरे हाथ से जंगल खत्म कर रहे हैं?
पेड़ और पौधे में फर्क समझना होगा
सरकारी आंकड़ों में करोड़ों पौधे लगाने की बात होती है, लेकिन पर्यावरण विज्ञान कहता है कि एक 50 से 100 साल पुराने वृक्ष की पारिस्थितिक भूमिका को कोई नया पौधा तुरंत नहीं बदल सकता।
एक परिपक्व पेड़ केवल ऑक्सीजन ही नहीं देता, बल्कि भूजल संरक्षण, तापमान नियंत्रण, जैव विविधता, पक्षियों और वन्यजीवों के आवास तथा कार्बन अवशोषण का भी महत्वपूर्ण स्रोत होता है।
यदि हजारों परिपक्व पेड़ काटकर उनकी जगह लाखों पौधे लगा भी दिए जाएं, तब भी उन पौधों को उसी स्तर तक पहुंचने में दशकों लग जाते हैं। यही कारण है कि पर्यावरणविद केवल वृक्षारोपण नहीं, बल्कि मौजूदा जंगलों के संरक्षण पर भी जोर देते हैं।
अदाणी परियोजनाएं और जंगलों का सवाल
मध्यप्रदेश के सिंगरौली क्षेत्र से लेकर छत्तीसगढ़ के कोयला क्षेत्रों तक कई परियोजनाओं को लेकर समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं। स्थानीय संगठनों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई की जा रही है, जिससे पर्यावरण और स्थानीय समुदाय प्रभावित हो सकते हैं।
दूसरी ओर सरकारों और परियोजना संचालकों का पक्ष यह रहा है कि सभी आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं, पर्यावरणीय मंजूरियों और नियामकीय शर्तों का पालन किया गया है। यही कारण है कि यह मुद्दा केवल पेड़ों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि विकास बनाम पर्यावरण की राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन चुका है।
विकास चाहिए, लेकिन किस कीमत पर?
कोई भी आधुनिक राष्ट्र बिना बिजली, उद्योग, खनिज संसाधनों और आधारभूत संरचना के विकास के आगे नहीं बढ़ सकता। रोजगार, निवेश और ऊर्जा देश की जरूरत हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास का मॉडल ऐसा होना चाहिए जिसमें सबसे पहले जंगलों की बलि दी जाए?
जब किसी परियोजना के लिए हजारों हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित होती है, तब केवल पेड़ नहीं कटते। उनके साथ मिट्टी का संतुलन, जल स्रोत, स्थानीय जलवायु और वन्यजीवों का पूरा तंत्र प्रभावित होता है।
भारत पहले ही भीषण गर्मी, जल संकट, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में जंगलों का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।
क्या वृक्षारोपण कटे जंगलों की भरपाई कर सकता है?
अधिकांश परियोजनाओं में प्रतिपूरक वृक्षारोपण (Compensatory Afforestation) का प्रावधान होता है। कंपनियां और सरकारें दावा करती हैं कि कटे हुए पेड़ों की जगह कई गुना अधिक पौधे लगाए जाएंगे।
लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार यह प्रश्न उठाते रहे हैं कि क्या किसी प्राकृतिक जंगल की भरपाई केवल पौधे लगाकर की जा सकती है?
एक प्राकृतिक वन केवल पेड़ों का समूह नहीं होता, बल्कि हजारों प्रजातियों का जीवित पारिस्थितिकी तंत्र होता है। उसकी जगह लगाए गए पौधों का जंगल वही जैव विविधता, वही पारिस्थितिक संतुलन और वही प्राकृतिक क्षमता नहीं दे सकता।
“एक पेड़ मां के नाम” या “एक जंगल उद्योग के नाम”?
यहीं पर यह नारा व्यंग्य में बदलता हुआ दिखाई देता है।
जब जनता से कहा जाता है कि वह अपनी मां के नाम एक पौधा लगाए, तब यह अपेक्षा भी स्वाभाविक है कि सरकारें और बड़े उद्योग समूह उन लाखों पुराने पेड़ों को बचाने की दिशा में भी गंभीर प्रयास करें जो पहले से धरती की सेवा कर रहे हैं।
यदि एक ओर वृक्षारोपण के रिकॉर्ड बनाए जाएं और दूसरी ओर विशाल वन क्षेत्रों को परियोजनाओं के लिए खोला जाए, तो जनता के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
पर्यावरण केवल अभियान नहीं, नीति का विषय है
पेड़ लगाना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है पहले से मौजूद जंगलों और वृक्षों को बचाना।
पर्यावरण संरक्षण केवल फोटो अवसर या सरकारी अभियान का विषय नहीं होना चाहिए। इसे विकास योजनाओं, औद्योगिक नीतियों और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से जोड़कर देखने की आवश्यकता है।
यदि देश को वास्तव में हरित भविष्य की ओर बढ़ना है, तो वृक्षारोपण और वन संरक्षण दोनों को समान प्राथमिकता देनी होगी।
देश को उद्योग चाहिए, रोजगार चाहिए, निवेश चाहिए और ऊर्जा भी चाहिए। लेकिन देश को जंगल, नदियां, जैव विविधता और स्वच्छ हवा भी चाहिए।
अन्यथा आने वाली पीढ़ियां शायद यह सवाल पूछें—
“जब करोड़ों पेड़ लगाए जा रहे थे, तब लाखों पुराने पेड़ आखिर कट क्यों रहे थे?”












