35 साल तक कॉलोनियां रहीं ‘नो मैन्स लैंड’… अब पंचायत की गोद में जाएंगी, लेकिन क्या गड्ढे, गंदगी और गंदा पानी भी साथ छोड़ देंगे?
बड़वाह | (सुनील परिहार) दो दिन तक गूंजते रहे धरना स्थल के नारे गुरुवार को शांत हो गए। विधायक सचिन बिरला के आश्वासन के बाद रेवा नगर, शर्मा कॉलोनी सहित 10 कॉलोनियों के करीब 1100 परिवारों ने अपना आंदोलन समाप्त कर दिया। घोषणा हुई कि 35 वर्षों से मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही इन कॉलोनियों को अब कस्बा पंचायत के सुपुर्द (हैंडओवर) किया जाएगा।
धरना स्थल पर विधायक ने रहवासियों के बीच बैठकर समस्याएं सुनीं और अधिकारियों को निर्देश दिए कि क्षतिग्रस्त पेयजल पाइपलाइन बदली जाए, सड़क-नाली निर्माण कराया जाए तथा कचरा संग्रहण व्यवस्था शुरू की जाए। आश्वासन मिलते ही धरना खत्म हुआ और लोगों के चेहरों पर उम्मीद की मुस्कान लौट आई।
लेकिन… अब असली कहानी शुरू होती है।
“हैंडओवर होगा… या हैंगओवर?”
कॉलोनियों का पंचायत में हस्तांतरण सुनने में जितना आसान लगता है, जमीन पर उतना ही कठिन है। सवाल यह है कि क्या फाइल पर लगने वाली एक मुहर 35 साल की धूल, कीचड़ और बदहाली को भी साफ कर देगी?
कहीं ऐसा तो नहीं कि अब तक लोग कहते थे “हम पंचायत में नहीं हैं”, और कुछ महीनों बाद कहने लगें “हम पंचायत में तो हैं… लेकिन काम अभी भी नहीं हुआ!”
पंचायत की नई ‘एंट्री’… जिम्मेदारियों की नई ‘बैटिंग’
इन 10 कॉलोनियों के जुड़ने से पंचायत का दायरा तो बढ़ जाएगा, लेकिन क्या संसाधन भी बढ़ेंगे? क्योंकि कस्बे के कई पुराने वार्ड आज भी टूटी सड़क, जाम नालियां, पानी की किल्लत और सफाई की शिकायतों से जूझ रहे हैं।
जनता पूछ रही है— “पुराने घाव अभी भरे नहीं… तो नए मरीजों का इलाज कैसे होगा?”
जनता के मन की चुभती बातें…
क्या हैंडओवर के साथ विकास भी ट्रांसफर होगा?
क्या 35 साल की प्रतीक्षा अब सचमुच खत्म होगी?
या फिर फाइलें दफ्तर-दफ्तर घूमती रहेंगी और जनता गड्ढे गिनती रहेगी?
क्या अगली बरसात तक सड़क बनेगी… या फिर नाव चलाने की तैयारी करनी होगी?











