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बड़वानी। भारत जैसे विशाल देश में जनसंख्या का सवाल केवल आंकड़ों का सवाल नहीं है। इसके साथ शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, आवास, खाद्य सुरक्षा, प्राकृतिक संसाधन और आने वाली पीढ़ियों के जीवन की गुणवत्ता जैसे अनेक प्रश्न जुड़े हैं। यही वजह है कि भारत सरकार दशकों से परिवार नियोजन और जनसंख्या स्थिरीकरण के लिए नीतियां और कार्यक्रम चला रही है। भारत ने 1952 में ही राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू कर दिया था और बाद में National Population Policy तथा National Health Mission के जरिए परिवार नियोजन सेवाओं और जनसंख्या स्थिरीकरण पर जोर दिया गया।

लेकिन इसी देश में जब सत्ता पक्ष का कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि सार्वजनिक मंच से किसी समुदाय के परिवारों से पांच बच्चे पैदा करने की अपील करता है, तो सवाल केवल उस बयान तक सीमित नहीं रहता। सवाल यह भी उठता है कि क्या ऐसे राजनीतिक संदेश सरकार की जनसंख्या स्थिरीकरण की व्यापक नीति के साथ तालमेल बैठाते हैं?

इसी बहस को जन्म दिया है खरगोन-बड़वानी के भाजपा सांसद गजेंद्र सिंह पटेल के हालिया बयान ने। बड़वानी में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने हिंदू परिवारों से पांच बच्चे पैदा करने की अपील करते हुए “हम दो, हमारे पांच” का नारा दिया। उन्होंने युवाओं से समय पर विवाह करने और परिवार बढ़ाने की बात भी कही।

सरकार की नीति क्या कहती है और मंच से संदेश क्या जा रहा है?

भारत की जनसंख्या नीति का इतिहास बताता है कि सरकार का दृष्टिकोण लंबे समय से परिवार नियोजन और जनसंख्या स्थिरीकरण की दिशा में रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार National Population Policy-2000 का उद्देश्य परिवार नियोजन की अपूर्ण जरूरतों, स्वास्थ्य सेवाओं और प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करना था। National Health Mission भी इसी नीति ढांचे के तहत परिवार नियोजन की जरूरतों को पूरा करने के लिए काम करता है।

दूसरी तरफ सांसद पटेल का संदेश परिवारों से बच्चों की संख्या बढ़ाने की अपील करता है। ऐसे में आम नागरिक के सामने स्वाभाविक सवाल है—सरकारी नीति का संदेश क्या है और राजनीतिक नेतृत्व का संदेश क्या है?

सरकार एक ओर परिवार नियोजन को स्वास्थ्य और जनसंख्या स्थिरीकरण के नजरिये से आगे बढ़ाती है और दूसरी ओर उसी सरकार का हिस्सा रहे राजनीतिक नेता यदि किसी समुदाय को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित करते हैं, तो दोनों संदेशों के बीच पैदा होने वाले अंतर पर चर्चा होना स्वाभाविक है।

क्या भारत आज भी ‘जनसंख्या विस्फोट’ के दौर में है?

यहां तस्वीर को केवल एक नारे या राजनीतिक दावे से समझना भी ठीक नहीं होगा।

UNFPA के 2025 के आंकड़ों के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर लगभग 1.9 बच्चे प्रति महिला है। भारत में प्रजनन दर पिछले दशकों में काफी कम हुई है। UNFPA के अनुसार 1970 के आसपास यह लगभग पांच बच्चों प्रति महिला थी, जो अब लगभग दो के आसपास पहुंच चुकी है। हालांकि राज्यों के बीच बड़ा अंतर मौजूद है।

यानी भारत के सामने आज सिर्फ “ज्यादा बच्चे” या “कम बच्चे” का एक सीधा सवाल नहीं है। देश एक बड़े जनसांख्यिकीय बदलाव से गुजर रहा है—कुछ राज्यों में प्रजनन दर अधिक है, जबकि कई राज्य replacement level से नीचे जा चुके हैं।

यही कारण है कि जनसंख्या पर गंभीर चर्चा धार्मिक पहचान के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महिलाओं की स्थिति, परिवार की आर्थिक क्षमता और क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय अंतर जैसे मुद्दों पर होनी चाहिए।

नेताओं के शब्द सिर्फ शब्द नहीं होते

किसी आम व्यक्ति द्वारा पांच बच्चे पैदा करने की सलाह देना और किसी निर्वाचित सांसद द्वारा सार्वजनिक मंच से ऐसा आह्वान करना एक जैसी बात नहीं है।

जनप्रतिनिधि के शब्दों को राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जाता है। उनके बयान समाज में बहस पैदा करते हैं और कई बार लोग उन्हें व्यापक राजनीतिक दृष्टिकोण का संकेत भी मानते हैं।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि किसी परिवार को कितने बच्चे पैदा करने चाहिए। यह निर्णय अंततः संबंधित व्यक्ति और परिवार का निजी निर्णय है। बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीतिक नेतृत्व को किसी समुदाय विशेष के लिए बच्चों की संख्या का सार्वजनिक लक्ष्य तय करने जैसा संदेश देना चाहिए?

और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार परिवार नियोजन, स्वास्थ्य सेवाओं और जनसंख्या स्थिरीकरण की दिशा में लगातार कार्यक्रम चला रही है, तब सत्ता पक्ष के नेताओं के ऐसे बयान उन सरकारी प्रयासों के बारे में जनता को क्या संदेश देते हैं?

जनसंख्या की बहस में आंकड़े जरूरी हैं, नारे नहीं

UNFPA की 2025 की रिपोर्ट भी इस बहस को केवल “population explosion” बनाम “population collapse” के रूप में देखने से बचने की बात करती है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रजनन दर करीब 2.0 तक पहुंच चुकी है, लेकिन राज्यों और सामाजिक परिस्थितियों के बीच महत्वपूर्ण अंतर हैं।

इसलिए जनसंख्या पर किसी भी गंभीर राजनीतिक चर्चा में आंकड़ों और नीतियों को सामने रखना जरूरी है।

यदि किसी क्षेत्र में प्रजनन दर कम हो रही है तो उसके कारण क्या हैं? यदि किसी क्षेत्र में ज्यादा है तो वहां शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार नियोजन की स्थिति क्या है? और यदि सरकार की चिंता जनसंख्या स्थिरीकरण है तो राजनीतिक नेतृत्व का सार्वजनिक संदेश उसी दिशा में है या उससे अलग?

गजेंद्र सिंह पटेल का “हम दो, हमारे पांच” वाला बयान इन सवालों को फिर से सार्वजनिक बहस के बीच ले आया है।

अब देखना यह है कि इस बयान को केवल राजनीतिक नारे के रूप में देखा जाएगा या सरकार की घोषित जनसंख्या नीति के संदर्भ में भी इस पर गंभीर चर्चा होगी।

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