

करोड़ों के अभियान, लेकिन नदियों में अब भी बह रहा प्रदूषण का काला सच
लोकेश कोचले । The India Speaks Desk
मध्य प्रदेश सरकार एक ओर “जल गंगा संवर्धन अभियान” के माध्यम से जल संरक्षण, तालाब पुनर्जीवन, भूजल संवर्धन और नदी संरक्षण के बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश की कई नदियों और सहायक जलधाराओं में बढ़ते प्रदूषण को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर जल संरचनाओं का निर्माण कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर नदियों में मिलते सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और प्रदूषित जल इन दावों की वास्तविकता पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।
क्या केवल तालाब बनाने से बच जाएंगी नदियां?
जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत राज्यभर में तालाबों के गहरीकरण, चेकडैम निर्माण, कुओं के पुनर्जीवन और वर्षा जल संचयन पर जोर दिया जा रहा है। सरकार का दावा है कि इससे भूजल स्तर सुधरेगा और जल संकट कम होगा।
लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि नदी संरक्षण केवल जल संरचनाओं के निर्माण तक सीमित नहीं हो सकता। यदि नदियों में लगातार प्रदूषित पानी मिल रहा हो, तो लाखों जल संरचनाएं भी नदी को स्वच्छ नहीं बना सकतीं।
नर्मदा की सहायक नदियों पर बढ़ते सवाल
मध्य प्रदेश की जीवन रेखा कही जाने वाली मां नर्मदा तक पहुंचने वाली अनेक सहायक नदियां आज प्रदूषण के आरोपों से घिरी हुई हैं। खरगोन जिले के बड़वाह क्षेत्र में बहने वाली वढाली नदी को लेकर स्थानीय स्तर पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।
स्थानीय लोगों का दावा है कि नदी का पानी कई स्थानों पर काला दिखाई देता है। यह नदी आगे जाकर चोरल नदी में मिलती है और चोरल नदी बाद में नर्मदा में समाहित हो जाती है। ऐसे में यदि किसी सहायक नदी की गुणवत्ता प्रभावित होती है तो उसका असर पूरे नदी तंत्र पर पड़ सकता है।
उद्योगों की जवाबदेही पर बड़ा प्रश्न
प्रदेश में संचालित डिस्टिलरी, केमिकल और अन्य रेड कैटेगरी उद्योगों को पर्यावरणीय मानकों का पालन करना अनिवार्य है। इन उद्योगों के लिए अपशिष्ट जल शोधन संयंत्र (ETP) और प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्था आवश्यक होती है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सभी उद्योग निर्धारित मानकों का पालन कर रहे हैं? क्या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा नियमित निगरानी की जा रही है? और यदि कहीं नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है तो उसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
WHO की चेतावनी: प्रदूषित जल केवल पर्यावरण नहीं, स्वास्थ्य संकट भी
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार दूषित जल विश्वभर में कई गंभीर बीमारियों का प्रमुख कारण है। प्रदूषित जल से हैजा, टाइफाइड, डायरिया, हेपेटाइटिस और अन्य जलजनित रोग फैल सकते हैं। WHO लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाना सार्वजनिक स्वास्थ्य की पहली आवश्यकता है।
“सुरक्षित पेयजल तक पहुंच मानव स्वास्थ्य की बुनियादी आवश्यकता है, जबकि प्रदूषित जल गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है।”
CPCB की रिपोर्टें भी बढ़ा चुकी हैं चिंता
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) समय-समय पर देश की नदी धाराओं की निगरानी करता है। पूर्व में जारी विभिन्न रिपोर्टों में देशभर की अनेक नदी धाराओं में प्रदूषण की समस्या चिन्हित की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रदूषण के स्रोतों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो नदी संरक्षण अभियान अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगे।
जल गंगा संवर्धन योजना की सफलता कैसे मापी जाए?
सरकारी आंकड़ों में जल संरचनाओं की संख्या, खुदाई किए गए तालाब और बनाए गए चेकडैम सफलता के पैमाने हो सकते हैं, लेकिन आम जनता के लिए असली पैमाना कुछ और है—
- क्या नदियों का पानी साफ हुआ?
- क्या प्रदूषण के स्रोत बंद हुए?
- क्या सहायक नदियों की गुणवत्ता सुधरी?
- क्या औद्योगिक अपशिष्ट पर नियंत्रण हुआ?
- क्या नदी किनारे रहने वाले लोगों को बदलाव महसूस हुआ?
यदि इन सवालों के जवाब सकारात्मक नहीं हैं, तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अभियान की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सबसे बड़ा सवाल
मां नर्मदा केवल एक नदी नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक जीवनरेखा है। यदि उसकी सहायक नदियां प्रदूषण की चपेट में हैं, तो जल गंगा संवर्धन जैसे अभियानों की सफलता केवल सरकारी आंकड़ों से नहीं आंकी जा सकती।
जब तक नदियों में गिरने वाले प्रदूषण के स्रोतों पर सख्त नियंत्रण नहीं होगा, तब तक जल संरक्षण के दावे और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी बनी रहेगी।
क्या मध्य प्रदेश की नदियों को वास्तव में बचाया जा रहा है, या जल संरक्षण के दावों के बीच प्रदूषण की समस्या अब भी अनदेखी रह गई है?











