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कभी 20 TCF गैस खोज का दावा, आज भी उठ रहे हैं उत्पादन और लागत वसूली पर सवाल

नई दिल्ली। The India Speaks Desk

कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन के दीनदयाल वेस्ट (DDW) गैस क्षेत्र को कभी भारत की सबसे बड़ी ऊर्जा खोजों में से एक बताया गया था। गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (GSPC) ने 2005 में इस क्षेत्र में विशाल गैस भंडार मिलने का दावा किया था। लेकिन दो दशक बाद भी यह परियोजना अपने शुरुआती दावों और अपेक्षाओं के अनुरूप परिणाम नहीं दे सकी है।

लागत बढ़ती गई, उत्पादन लक्ष्य से बहुत पीछे रहा

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार परियोजना की स्वीकृत विकास लागत 2.75 अरब डॉलर थी, लेकिन मार्च 2015 तक कुल खर्च बढ़कर लगभग 3.41 अरब डॉलर (करीब ₹19,500 से ₹20,000 करोड़) तक पहुंच गया। इसके बावजूद दीनदयाल वेस्ट क्षेत्र से औसत गैस उत्पादन केवल 19.45 एमएमएससीएफडी (मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक फीट प्रतिदिन) रहा, जबकि लक्ष्य 200 एमएमएससीएफडी का था। यानी उत्पादन लक्ष्य का लगभग 10 प्रतिशत ही हासिल हो सका।

बढ़ते कर्ज के बीच ONGC को बेची गई हिस्सेदारी

परियोजना पर बढ़ते खर्च और GSPC पर बढ़ते कर्ज के बीच 2017 में ONGC ने इस ब्लॉक में GSPC की 80 प्रतिशत हिस्सेदारी और ऑपरेटरशिप लगभग ₹7,738 करोड़ में खरीद ली। ONGC को उम्मीद थी कि अपनी तकनीकी विशेषज्ञता और अतिरिक्त निवेश के जरिए वह उत्पादन बढ़ाने में सफल होगी।

ONGC के हाथ भी नहीं लगी बड़ी सफलता

ONGC के अधिग्रहण के बाद भी दीनदयाल क्षेत्र अपेक्षित स्तर का उत्पादन नहीं दे सका। हाल के वर्षों में इस क्षेत्र के लिए तकनीकी और वित्तीय साझेदार तलाशने की कोशिशें भी हुईं, लेकिन रिपोर्टों के अनुसार पर्याप्त रुचि नहीं मिली। कई रिपोर्टों में यह भी उल्लेख किया गया कि अधिग्रहण के बाद क्षेत्र से उत्पादन अपेक्षाकृत नगण्य रहा।

क्या ₹20 हजार करोड़ की लागत वसूल हो गई?

सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों में ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता कि परियोजना अपनी कुल लागत की भरपाई कर चुकी है। कम उत्पादन, लागत वृद्धि और अपेक्षाओं से कमजोर प्रदर्शन को देखते हुए ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि यह परियोजना अब भी भारत के सबसे विवादित गैस खोज अभियानों में गिनी जाती है।

बड़ा सवाल

जब लगभग ₹20 हजार करोड़ का निवेश, विशाल गैस भंडार के दावे और वर्षों का विकास कार्य भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका, तो यह सवाल आज भी बना हुआ है कि आखिर प्रारंभिक अनुमान इतने अलग क्यों निकले और इस निवेश से देश को वास्तविक लाभ कितना मिला?

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