जंगल बचेंगे या मुनाफाखोरी जीतेगी? संरक्षित वन क्षेत्रों में कथित अवैध निर्माण पर उठे बड़े सवाल
रांची। The India Speaks Desk
देश में एक ओर बाघों और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर संरक्षित वन क्षेत्रों और पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्रों में कथित अवैध व्यावसायिक निर्माण के आरोपों ने पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
झारखंड के पलामू टाइगर रिजर्व, बेतला राष्ट्रीय उद्यान, नेतरहाट और महुआडांड़ वुल्फ अभयारण्य के पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र (ईएसजेड) में बड़ी संख्या में होटल और रिसॉर्ट निर्माण का मामला अब राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) तक पहुंच चुका है। मामले को गंभीर मानते हुए एनजीटी ने संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
क्या जंगलों को पर्यटन कारोबार की प्रयोगशाला बनाया जा रहा है?
याचिका में आरोप लगाया गया है कि जिन क्षेत्रों को पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना गया है, वहीं बड़े पैमाने पर व्यावसायिक निर्माण गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। आरोप यह भी है कि इन निर्माण कार्यों के दौरान पर्यावरणीय नियमों और संरक्षण संबंधी प्रावधानों का समुचित पालन नहीं किया गया।
यदि ये आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल एक निर्माण विवाद नहीं बल्कि देश की पर्यावरण संरक्षण व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न होगा। आखिर जिन क्षेत्रों को वन्यजीवों के सुरक्षित आवास के रूप में संरक्षित किया गया है, वहां व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा कैसे मिला? क्या संबंधित विभागों ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया या फिर नियमों की अनदेखी को मौन स्वीकृति दी गई?
जवाबदेही से जुड़े बड़े सवाल
पूरा मामला अब कई महत्वपूर्ण सवालों को जन्म दे रहा है। यदि संवेदनशील वन क्षेत्रों में होटल और रिसॉर्ट निर्माण हो रहे थे तो वन विभाग की निगरानी व्यवस्था कहां थी? पर्यावरणीय मंजूरियों की स्थिति क्या है? क्या निर्माण कार्यों का नियमित निरीक्षण किया गया? और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
जनता के मन में यह सवाल भी उठ रहा है कि जब आम नागरिकों के लिए पर्यावरणीय नियमों का सख्ती से पालन कराया जाता है, तब संरक्षित क्षेत्रों में बड़े व्यावसायिक निर्माण कार्यों पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
पर्यावरण और वन्यजीवों के लिए गंभीर खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि टाइगर रिजर्व और अभयारण्यों के आसपास अनियंत्रित निर्माण गतिविधियां वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन, प्रजनन क्षेत्र और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं। लगातार बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियां जंगलों के मूल स्वरूप को भी प्रभावित करती हैं।
बाघों और अन्य वन्यजीवों के संरक्षण के लिए बनाए गए क्षेत्रों में यदि होटल और रिसॉर्ट संस्कृति को अनियंत्रित रूप से बढ़ावा मिलता है, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। यही कारण है कि पर्यावरणीय कानून ऐसे क्षेत्रों के लिए विशेष सुरक्षा प्रावधान निर्धारित करते हैं।
एनजीटी की कार्रवाई के बाद बढ़ी उम्मीदें
राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद अब इस मामले की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय होने की उम्मीद बढ़ी है। पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित पक्षों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
जनता पूछ रही है – जंगल किसके लिए बचाए जा रहे हैं?
यह मामला अब केवल झारखंड के कुछ वन क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गया है। यह पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण, वन विभाग की जवाबदेही और कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन पर बहस का विषय बन चुका है।
जब सरकारें जंगल बचाने और वन्यजीव संरक्षण के बड़े दावे करती हैं, तब ऐसे मामलों का सामने आना स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में संदेह पैदा करता है। यदि संरक्षित क्षेत्रों में भी नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है, तो फिर पर्यावरण संरक्षण की नीतियों का वास्तविक उद्देश्य क्या रह जाता है?
“जंगल केवल पर्यटन और मुनाफे का साधन नहीं हैं। वे आने वाली पीढ़ियों की प्राकृतिक धरोहर हैं। यदि संरक्षण क्षेत्रों में भी नियमों का पालन नहीं होगा, तो सबसे बड़ा नुकसान देश की पर्यावरणीय सुरक्षा को होगा।”











