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महंगाई की मार, जेब खाली और जिम्मेदारों की चुप्पी; 8 हजार की नौकरी करने वाले कर्मचारियों ने दी हड़ताल की चेतावनी

बड़वाह। लोकेश कोचले| The India Speaks

एक तरफ सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के दावे कर रही है, दूसरी तरफ उन्हीं स्वास्थ्य संस्थानों में काम करने वाले आउटसोर्स कर्मचारी तीन-तीन महीने से बिना वेतन के काम करने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि जब कर्मचारियों की मेहनत समय पर ली जा रही है तो उनका मेहनताना आखिर किसकी लापरवाही की भेंट चढ़ गया?

बड़वाह ब्लॉक स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत ग्रुप-डी, डेटा एंट्री ऑपरेटर और मल्टी स्किल कर्मचारियों का सब्र अब जवाब देने लगा है। महज 8 हजार रुपये मासिक वेतन पर अपने परिवार का भरण-पोषण करने वाले इन कर्मचारियों को पिछले तीन माह से वेतन नहीं मिला है। आर्थिक तंगी इस कदर बढ़ गई है कि कई कर्मचारियों के सामने रोजाना ड्यूटी पर आने-जाने तक का संकट खड़ा हो गया है।

ज्ञापन में छलका दर्द, पांच दिन का अल्टीमेटम

कर्मचारियों ने ब्लॉक चिकित्सा अधिकारी को ज्ञापन सौंपते हुए साफ कहा है कि तीन महीने से वेतन नहीं मिलने के कारण किराया, पेट्रोल, बच्चों की पढ़ाई और घरेलू खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। कर्मचारियों ने पांच दिनों के भीतर वेतन भुगतान की मांग की है और चेतावनी दी है कि यदि समस्या का समाधान नहीं हुआ तो वे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने को मजबूर होंगे।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन कर्मचारियों के भरोसे अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्रों का कामकाज चल रहा है, उनकी बुनियादी जरूरतों की चिंता आखिर कौन करेगा?

विभाग ने झाड़ा पल्ला, कंपनी ने भी नहीं दिया स्पष्ट जवाब

जब इस मामले में The India Speaks ने ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर श्री मिमरोट से चर्चा की तो उनका कहना था कि विभाग की ओर से कर्मचारियों की उपस्थिति समय पर भेज दी जाती है।

यानी विभाग का दावा है कि उसकी जिम्मेदारी पूरी हो चुकी है।

वहीं जब संबंधित आउटसोर्स एजेंसी न्यू बुंदेलखंड सिक्योरिटी सर्विसेज के संचालक अंकित पाठक से संपर्क किया गया तो उन्होंने बताया कि कंपनी को हाल ही में टेंडर मिला है और कर्मचारियों के दस्तावेज भी अभी पूरी तरह प्राप्त नहीं हुए हैं।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि विभाग अपनी जिम्मेदारी निभा चुका है और कंपनी को टेंडर भी मिल चुका है, तो फिर कर्मचारियों का वेतन आखिर किस स्तर पर अटका हुआ है?

ठेकेदार बदले, सिस्टम बदला… लेकिन पीस गए कर्मचारी

सरकारी विभागों में ठेका बदलना कोई नई बात नहीं है, लेकिन हर बार सबसे ज्यादा नुकसान निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों को ही क्यों उठाना पड़ता है?

क्या ठेका परिवर्तन की प्रक्रिया के दौरान कर्मचारियों का वेतन रोक देना उचित है?

क्या शासन और प्रशासन के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिससे कर्मचारियों का भुगतान समय पर सुनिश्चित किया जा सके?

और सबसे अहम सवाल — यदि कर्मचारी आर्थिक तंगी के कारण हड़ताल पर चले जाते हैं तो स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ने वाले असर की जिम्मेदारी कौन लेगा?

कर्मचारियों की पीड़ा या प्रशासनिक उदासीनता?

तीन महीने तक किसी कर्मचारी को वेतन न मिलना केवल एक वित्तीय समस्या नहीं बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का उदाहरण भी माना जा सकता है। जिन लोगों के कंधों पर अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों की व्यवस्थाएं टिकी हैं, वे आज अपने ही अधिकार के लिए दर-दर गुहार लगाने को मजबूर हैं।

बड़वाह का यह मामला सिर्फ कुछ कर्मचारियों की तनख्वाह का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है जो समय पर काम तो चाहती है, लेकिन समय पर भुगतान सुनिश्चित नहीं कर पाती।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पांच दिन की चेतावनी के बाद जिम्मेदार अधिकारी और संबंधित कंपनी कर्मचारियों को राहत देते हैं या फिर मामला हड़ताल और आंदोलन की ओर बढ़ता है।

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